10 साल बाद प्रशासनिक महकमे में बड़ा बदलाव: 190 तहसीलदार और SLR को मिला डिप्टी कलेक्टर का दर्जा, पूरी लिस्ट जारी

मध्य प्रदेश सरकार ने एक दशक से लंबित 190 तहसीलदार, अधीक्षक भू-अभिलेख और प्रभारी डिप्टी कलेक्टरों को राज्य प्रशासनिक सेवा में डिप्टी कलेक्टर पद पर पदोन्नत किया है।

10 साल बाद प्रशासनिक महकमे में बड़ा बदलाव: 190 तहसीलदार और SLR को मिला डिप्टी कलेक्टर का दर्जा, पूरी लिस्ट जारी

190 तहसीलदार, अधीक्षक भू-अभिलेख डिप्टी कलेक्टर पद पर पदोन्नत।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर आदेश जारी।

नायब तहसीलदारों की पदोन्नति प्रक्रिया भी जल्द होगी।

भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार ने लंबे समय से लंबित प्रशासनिक पदोन्नति प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए राज्य के 190 तहसीलदारों, अधीक्षक भू-अभिलेख (एसएलआर) और प्रभारी डिप्टी कलेक्टरों को नियमित रूप से डिप्टी कलेक्टर पद पर पदोन्नत कर दिया है। सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) द्वारा मंगलवार को जारी आदेश के बाद वर्षों से पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है। यह निर्णय विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक में मंजूरी मिलने के बाद लिया गया।

करीब एक दशक से मध्य प्रदेश में पदोन्नति प्रक्रिया कानूनी और तकनीकी कारणों से प्रभावित रही थी। ऐसे में सरकार के इस फैसले को प्रशासनिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पदोन्नति आदेश जारी होने के साथ ही संबंधित अधिकारियों में खुशी का माहौल है।

अब सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारी होंगे

जारी आदेश के अनुसार पदोन्नत किए गए सभी अधिकारियों को कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से राज्य प्रशासनिक सेवा के कनिष्ठ श्रेणी वेतनमान में नियुक्त माना जाएगा। उन्हें पे-मैट्रिक्स लेवल-12 (15600-39100 रुपये + 5400 ग्रेड पे) का लाभ मिलेगा।

अब तक ये अधिकारी राजस्व विभाग के अधीन कार्यरत थे, लेकिन नियमित पदोन्नति के बाद इन्हें सामान्य प्रशासन विभाग का अधिकारी माना जाएगा। इससे इनके सेवा संबंधी मामलों का संचालन भी जीएडी के माध्यम से किया जाएगा।

फिलहाल नहीं बदले जाएंगे जिले

सरकार ने प्रशासनिक कार्यों में किसी प्रकार की बाधा न आए, इसे ध्यान में रखते हुए फिलहाल पदोन्नत अधिकारियों के स्थानांतरण नहीं किए हैं। सभी अधिकारियों को उसी जिले में कार्य जारी रखने के निर्देश दिए गए हैं, जहां वे वर्तमान में पदस्थ हैं। इससे राजस्व और प्रशासनिक कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी।

कार्यवाहक पद नहीं संभालने वालों को भी मिला लाभ

आदेश की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि उन अधिकारियों को भी पदोन्नति का लाभ दिया गया है, जिन्हें पहले प्रभारी डिप्टी कलेक्टर या अधीक्षक भू-अभिलेख के रूप में दायित्व सौंपा गया था, लेकिन किसी कारणवश उन्होंने कार्यवाहक उच्च पद का प्रभार ग्रहण नहीं किया था। सरकार ने ऐसे अधिकारियों को भी नियमित पदोन्नति के दायरे में शामिल किया है।

सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगी पदोन्नतियां

हालांकि सामान्य प्रशासन विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी पदोन्नति प्रक्रिया अंतरिम प्रकृति की है। मध्य प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण से जुड़े मामले वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। ऐसे में इन पदोन्नतियों की वैधता और भविष्य सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय तथा आगे जारी होने वाले आदेशों के अधीन रहेगा। यदि न्यायालय के निर्णय के अनुसार कोई बदलाव आवश्यक होगा तो सरकार उसी के अनुरूप कार्रवाई करेगी।

इंदौर में हुई डीपीसी बैठक के बाद जारी हुआ आदेश

जानकारी के अनुसार सोमवार को इंदौर स्थित लोक सेवा आयोग कार्यालय में विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक आयोजित की गई थी। बैठक में सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव एम. सेलवेंद्रन और राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव ई. रमेश कुमार सहित वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।

बैठक में पदोन्नति के लिए प्रस्तावित अधिकारियों के नामों पर विस्तार से चर्चा की गई और पात्र अधिकारियों के चयन पर अंतिम सहमति बनी। इसके बाद मंगलवार को 190 अधिकारियों की पदोन्नति के आदेश जारी कर दिए गए।

लगभग 250 नामों पर हुआ था विचार

सूत्रों के अनुसार विभागीय पदोन्नति समिति के सामने करीब 250 प्रभारी तहसीलदार, तहसीलदार और एसएलआर अधिकारियों के नाम रखे गए थे। पात्रता, सेवा रिकॉर्ड और अन्य निर्धारित मानकों के आधार पर पहले चरण में 190 अधिकारियों को डिप्टी कलेक्टर पद पर पदोन्नत किया गया है। शेष अधिकारियों के मामलों पर भी आगे विचार किया जा सकता है।

प्रशासनिक व्यवस्था को मिलेगा लाभ

सरकार के इस फैसले से प्रशासनिक तंत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है। लंबे समय से रिक्त या प्रभारी व्यवस्था के भरोसे चल रहे कई पद अब नियमित अधिकारियों से भर सकेंगे। इससे राजस्व और प्रशासनिक कार्यों में तेजी आने के साथ-साथ अधिकारियों के मनोबल में भी वृद्धि होगी।

राज्य सरकार का यह कदम वर्षों से लंबित पदोन्नति प्रक्रिया को गति देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि अंतिम स्थिति सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।