14 दोषियों को उम्रकैद सुनाने वाली महिला जज को मिली धमकियां, हाईकोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान; MP सरकार, DGP और गृह विभाग से मांगा जवाब

नर्मदापुरम मॉब लिंचिंग मामले में 14 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाने वाली एडीजे तबस्सुम खान को सोशल मीडिया पर कथित धमकियां मिलने के बाद मामला गंभीर हो गया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए डीजीपी और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से तीन दिन में हलफनामा मांगा है।

14 दोषियों को उम्रकैद सुनाने वाली महिला जज को मिली धमकियां, हाईकोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान; MP सरकार, DGP और गृह विभाग से मांगा जवाब

भोपाल/नर्मदापुरम। मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम जिले के चर्चित मॉब लिंचिंग मामले में 14 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने वाली अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) तबस्सुम खान को कथित तौर पर सोशल मीडिया के जरिए धमकियां मिलने का मामला अब गंभीर संवैधानिक और न्यायिक मुद्दा बन गया है। न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां, धमकी भरे संदेश और भड़काऊ वीडियो सामने आने के बाद पूरे मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) लेते हुए प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से तीन दिन के भीतर हलफनामा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने भी न्यायिक अधिकारियों को धमकाने की घटनाओं पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा की मांग की है।

12 जून को सुनाया था ऐतिहासिक फैसला

जानकारी के अनुसार, एडीजे तबस्सुम खान ने 12 जून को नर्मदापुरम के चर्चित मॉब लिंचिंग मामले में 14 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। फैसले के बाद सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर न्यायालय और न्यायाधीश के खिलाफ कई आपत्तिजनक पोस्ट और वीडियो वायरल होने लगे।

इन पोस्टों में फैसले को लेकर भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल किया गया। कुछ वीडियो में कथित तौर पर न्यायाधीश को धार्मिक आधार पर निशाना बनाते हुए धमकी भरे बयान भी दिए गए, जिससे कानून-व्यवस्था और न्यायिक स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

वायरल वीडियो से बढ़ा विवाद

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर वायरल हुए एक वीडियो में एक युवक कथित रूप से यह कहते हुए सुनाई देता है कि यदि "14 भाइयों" को 10 दिनों के भीतर रिहा नहीं किया गया तो पूरे प्रदेश और देश में "कत्लेआम" होगा। वीडियो में न्यायाधीश को लेकर भी कथित तौर पर धार्मिक आधार पर आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणियां की गईं।

वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस और प्रशासन हरकत में आया। अधिकारियों ने इसे केवल एक व्यक्ति के बयान का मामला न मानकर न्यायिक व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करने का प्रयास माना।

हाईकोर्ट ने कहा- फैसले से असहमति का तरीका धमकी नहीं

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ के जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी को केवल इसलिए धमकाया नहीं जा सकता क्योंकि उसका फैसला किसी पक्ष या समाज के किसी वर्ग को पसंद नहीं आया।

खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी को न्यायालय के निर्णय पर आपत्ति है तो उसके लिए अपीलीय अदालत का कानूनी रास्ता उपलब्ध है। सोशल मीडिया पर न्यायाधीशों के खिलाफ अभियान चलाना, धमकाना या उन्हें बदनाम करना न्यायिक प्रक्रिया पर दबाव बनाने का प्रयास है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इसी के साथ हाईकोर्ट ने प्रदेश के डीजीपी और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से तीन दिन के भीतर विस्तृत हलफनामा मांगा है कि अब तक क्या कार्रवाई की गई है और न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

SCAORA ने जताई कड़ी नाराजगी

करीब तीन हजार एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड का प्रतिनिधित्व करने वाले सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने भी घटना पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

संगठन ने कहा कि न्यायपालिका लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है और किसी भी न्यायिक आदेश को चुनौती देने का वैधानिक तरीका केवल अपीलीय अदालत में जाना है। जजों को सोशल मीडिया पर धमकाना, बदनाम करना या उनके खिलाफ अभियान चलाना न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।

एसोसिएशन ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि यदि ऐसे मामलों पर समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में न्यायिक अधिकारियों पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।

पुलिस ने स्वयं संज्ञान लेकर दर्ज किया मामला

सिवनी मालवा पुलिस ने मामले में किसी औपचारिक शिकायत का इंतजार किए बिना स्वयं संज्ञान लेते हुए 22 जून को दो अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया।

थाना प्रभारी सुधाकर बारस्कर ने बताया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और अन्य पोस्ट की जांच की जा रही है। जिन लोगों ने भड़काऊ या धमकी भरी सामग्री साझा की है, उनकी पहचान कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अब तक एडीजे की ओर से कोई औपचारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई है, लेकिन कानून-व्यवस्था और न्यायिक सुरक्षा को देखते हुए पुलिस ने स्वत: कार्रवाई शुरू कर दी है।

150 सोशल मीडिया अकाउंट रडार पर

जिले के पुलिस अधीक्षक साईं कृष्णा एस. थोटा ने बताया कि सोशल मीडिया पर कानून-व्यवस्था बिगाड़ने, सांप्रदायिक तनाव फैलाने या न्यायपालिका को धमकाने वाली सामग्री पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

उन्होंने बताया कि अब तक लगभग 150 सोशल मीडिया अकाउंट चिह्नित किए जा चुके हैं। इन अकाउंट से साझा किए गए कई आपत्तिजनक पोस्ट और लिंक हटवाए गए हैं। संबंधित सोशल मीडिया कंपनियों से इन अकाउंट संचालकों की जानकारी मांगी गई है ताकि उनकी पहचान कर आगे की वैधानिक कार्रवाई की जा सके।

पुलिस उन लोगों की भी जानकारी जुटा रही है जो सिवनी मालवा पहुंचकर कथित रूप से भड़काऊ भाषण देने या माहौल खराब करने का प्रयास कर रहे थे।

महिला जज की सुरक्षा बढ़ाई गई

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने एडीजे तबस्सुम खान की सुरक्षा बढ़ा दी है। एसपी साईं कृष्णा एस. थोटा ने बताया कि न्यायाधीश की सुरक्षा के लिए छह पुलिसकर्मियों की विशेष ड्यूटी लगाई गई है।

सुरक्षाकर्मी न्यायालय परिसर और न्यायाधीश के आवास दोनों स्थानों पर तैनात हैं। इसके अलावा उन्हें एक पीसीओ (पर्सनल कम्युनिकेशन ऑफिसर) भी उपलब्ध कराया गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत संपर्क किया जा सके।

एसपी ने बताया कि सिवनी मालवा के एसडीओपी, थाना प्रभारी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक तथा वे स्वयं लगातार न्यायाधीश के संपर्क में हैं और सुरक्षा व्यवस्था की नियमित समीक्षा की जा रही है।

9 जुलाई को होगी अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों से कार्रवाई की विस्तृत जानकारी मांगी है। मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को निर्धारित की गई है। इस दौरान कोर्ट यह भी देखेगा कि धमकी देने वालों की पहचान, गिरफ्तारी और न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा को लेकर प्रशासन ने क्या-क्या कदम उठाए हैं।

यह मामला अब केवल एक न्यायाधीश को मिली धमकियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, कानून के शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ धमकी और सोशल मीडिया पर चलाए जाने वाले दुष्प्रचार पर प्रभावी कार्रवाई न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।