दो दिन की बारिश में ढह गया जालौन का 200 साल पुराना ताईबाई महल, ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण पर उठे सवाल

दो दिन की बारिश में जालौन नगर का करीब 200 वर्ष पुराना ऐतिहासिक ताईबाई महल अचानक भरभराकर धराशायी हो गया। कभी तहसील भवन के रूप में इस्तेमाल होने वाली यह इमारत पहले से जर्जर थी, जिसके चलते तहसील कार्यालय नए भवन में स्थानांतरित कर दिया गया था।

दो दिन की बारिश में ढह गया जालौन का 200 साल पुराना ताईबाई महल, ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण पर उठे सवाल

दो दिन की बारिश में 200 साल पुराना ऐतिहासिक महल धराशायी, छुट्टी के कारण टला बड़ा हादसा

कभी तहसील कार्यालय रहा ताईबाई महल बारिश में ढहा, ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण पर सवाल

जर्जर इमारत ने आखिरकार छोड़ा साथ, बारिश में भरभराकर गिरा ताईबाई महल

उरई। दो दिनों से हो रही रिमझिम बारिश ने जालौन नगर की करीब 200 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक धरोहर को भी नहीं बख्शा। नगर के बीचों-बीच स्थित ऐतिहासिक ताईबाई महल अचानक भरभराकर धराशायी हो गया। यह वही भवन है, जिसे लंबे समय तक तहसील भवन के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा। भवन की हालत काफी समय से जर्जर थी और इसी को देखते हुए तहसील कार्यालय को कुछ समय पहले नए भवन में स्थानांतरित कर दिया गया था।

महल के अचानक गिरने से आसपास के लोगों में अफरा-तफरी मच गई। हालांकि राहत की बात यह रही कि जिस समय पुराना भवन धराशायी हुआ, उस समय तहसील कार्यालय की छुट्टी थी। ऐसे में वहां कर्मचारियों और आम लोगों की आवाजाही नहीं थी। यदि यह हादसा किसी कार्यदिवस के दौरान हुआ होता तो बड़ा जनहानि वाला हादसा हो सकता था।

जर्जर हालत में पहुंच चुका था ऐतिहासिक भवन

स्थानीय लोगों के अनुसार ताईबाई महल काफी लंबे समय से जर्जर स्थिति में था। भवन की दीवारों और अन्य हिस्सों में समय के साथ कमजोरी आती गई। बारिश के कारण पुरानी संरचना पर दबाव और बढ़ गया। दो दिन की लगातार रिमझिम बारिश के बाद भवन का एक बड़ा हिस्सा अचानक भरभराकर गिर पड़ा।

ताईबाई महल की पहचान केवल एक पुराने भवन के रूप में नहीं, बल्कि जालौन के इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण धरोहर के रूप में होती रही है। बाद के वर्षों में इसी भवन में तहसील कार्यालय संचालित होता रहा। प्रशासनिक कामकाज के लिए भवन का लंबे समय तक इस्तेमाल किया गया, लेकिन भवन की स्थिति खराब होने के बाद तहसील कार्यालय को नए भवन में स्थानांतरित कर दिया गया।

छुट्टी के दिन गिरा भवन, टला बड़ा हादसा

महल के धराशायी होने का समय बेहद महत्वपूर्ण रहा। घटना के समय तहसील कार्यालय में छुट्टी थी। सामान्य कार्यदिवस में यहां अधिकारियों, कर्मचारियों, अधिवक्ताओं और फरियादियों की आवाजाही रहती थी। ऐसे में यदि भवन उस दौरान गिरता तो बड़ी संख्या में लोग इसकी चपेट में आ सकते थे।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जर्जर भवनों की समय-समय पर जांच और सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है। ऐतिहासिक इमारत होने के कारण ताईबाई महल के संरक्षण की दिशा में भी गंभीर प्रयास किए जाने की आवश्यकता थी। भवन के गिर जाने के बाद अब यह सवाल भी उठ रहा है कि जिले की अन्य पुरानी और जर्जर ऐतिहासिक इमारतों की स्थिति क्या है और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

जिले की पांचों तहसीलों में बारिश का असर

लगातार बारिश का असर केवल ताईबाई महल तक सीमित नहीं रहा। जिले की पांचों तहसीलों में करीब एक सैकड़ा कच्चे मकानों के बारिश के कारण धराशायी होने की जानकारी सामने आई है। कई परिवारों के सामने बारिश के बीच रहने की समस्या खड़ी हो गई है।

मकानों के गिरने की जानकारी के बाद जिलाधिकारी समीर ने सभी उप जिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि प्रभावित क्षेत्रों में शीघ्र सर्वे कराया जाए। जिन लोगों के मकान बारिश के कारण गिरे हैं, उनके नुकसान का आकलन कर नियमानुसार मुआवजा उपलब्ध कराने की कार्रवाई की जाए।

प्रशासन की ओर से सर्वे के माध्यम से यह पता लगाया जाना है कि कितने मकान पूरी तरह या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। इसके बाद पात्र प्रभावित परिवारों को सरकारी प्रावधानों के तहत राहत उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

ताईबाई का संबंध 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से

ताईबाई महल के इतिहास को स्थानीय लोग 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जोड़कर देखते हैं। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार महारानी ताईबाई का संबंध वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई से रहा था। उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

बताया जाता है कि ताईबाई ने तात्या टोपे के साथ भी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया था। उस दौर में बुंदेलखंड के विभिन्न इलाकों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह की लहर थी और ताईबाई ने भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाई।

स्थानीय इतिहास से जुड़े विवरणों के मुताबिक कानपुर की लड़ाई के बाद तात्या टोपे के लौटने पर भी ताईबाई ने संघर्ष जारी रखा। कहा जाता है कि उन्होंने अपने आभूषण तक बेचकर सेना तैयार की और अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने के लिए संसाधन जुटाए।

बुंदेलखंड के कई इलाकों में संघर्ष का उल्लेख

ताईबाई के संघर्ष का संबंध जालौन के अलावा बुंदेलखंड के कई क्षेत्रों से बताया जाता है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में जालौन, कनार, कालपी, आटा, उरई, मोहम्मदाबाद, कोटरा और कोंच सहित कई क्षेत्रों में उनके अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का उल्लेख मिलता है।

बताया जाता है कि अंग्रेजी शासन ने ताईबाई और उनके सहयोगियों के खिलाफ राजद्रोह और विद्रोह के आरोप लगाए थे। बाद में उन्हें जालौन से दूर मुंगेर, बिहार भेजे जाने की बात कही जाती है। स्थानीय इतिहास के अनुसार कैदी जीवन के दौरान वर्ष 1870 में उनका निधन हुआ।

ताईबाई के जीवन और संघर्ष से जुड़े इन ऐतिहासिक विवरणों को लेकर स्थानीय स्तर पर लंबे समय से उनकी विरासत को संरक्षित करने की मांग उठती रही है।

प्रतिमा स्थापित करने की भी उठती रही मांग

जालौन में ताईबाई की ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने और उनकी प्रतिमा स्थापित करने की मांग भी लंबे समय से की जाती रही है। स्थानीय लोगों की ओर से मुख्यमंत्री और जिले के अधिकारियों को ज्ञापन देकर विभिन्न अवसरों पर यह मांग उठाई गई है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि देवनगर चौराहे के सुंदरीकरण के बाद वहां ताईबाई की प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी को उनके संघर्ष और इतिहास के बारे में जानकारी मिल सके।

अब जब ताईबाई से जुड़ा करीब 200 वर्ष पुराना बताया जा रहा ऐतिहासिक भवन ही धराशायी हो गया है, तो ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सामने आ गया है।

धरोहर संरक्षण को लेकर खड़े हुए सवाल

ताईबाई महल का गिरना केवल एक पुराने भवन के ढहने की घटना नहीं है। यह जालौन की ऐतिहासिक विरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण स्थल के अस्तित्व के समाप्त होने की घटना भी है। भवन पहले ही जर्जर घोषित स्थिति में पहुंच चुका था और इसी कारण तहसील कार्यालय को वहां से हटाया गया था।

अब महल के धराशायी होने के बाद लोगों के बीच यह चर्चा तेज है कि जिले में मौजूद अन्य ऐतिहासिक और पुरानी इमारतों की स्थिति का भी सर्वे कराया जाना चाहिए। यदि समय रहते ऐसी इमारतों की पहचान कर उनके संरक्षण, मरम्मत या सुरक्षित करने की योजना बनाई जाए तो ऐतिहासिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाया जा सकता है।

बारिश ने जहां जिले के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कच्चे मकानों को नुकसान पहुंचाया है, वहीं ताईबाई महल का ढहना जालौन के इतिहास के लिए भी एक बड़ा झटका माना जा रहा है। अब प्रशासन के सामने एक ओर बारिश से प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने की चुनौती है, तो दूसरी ओर बची हुई ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है