टूटी दीवारें, डगमगाती छत… कब गिर पड़ेगा स्कूल भवन? भारकच्छ कला के शासकीय विद्यालय में बड़ा खतरा, बच्चों की जान पर मंडरा रहा संकट

भारकच्छ कला के शासकीय बालक माध्यमिक शाला का भवन जर्जर, दीवारों और छत से हादसे का खतरा; 139 बच्चे सुरक्षित माहौल के बजाय एक हॉल में दो पालियों में पढ़ने को मजबूर

टूटी दीवारें, डगमगाती छत… कब गिर पड़ेगा स्कूल भवन? भारकच्छ कला के शासकीय विद्यालय में बड़ा खतरा, बच्चों की जान पर मंडरा रहा संकट

अनुज ठाकुर 

जर्जर भवन में कक्षा 1 से 8 तक की पढ़ाई, कार्यालय भी इसी इमारत में संचालित; ग्रामीणों और स्कूल स्टाफ ने कई बार उठाई मरम्मत या नए भवन की मांग, प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की उम्मीद

भारकच्छ कला (रायसेन)। ग्राम भारकच्छ कला स्थित शासकीय बालक माध्यमिक शाला का भवन लंबे समय से जर्जर हालत में पहुंच चुका है। भवन की क्षतिग्रस्त दीवारें और टूटती छत किसी बड़े हादसे की आशंका को लगातार बढ़ा रही हैं। विद्यालय में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों के साथ शिक्षक भी ऐसे भवन में बैठकर पढ़ाने और काम करने को मजबूर हैं, जहां हर समय सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है।

विद्यालय भवन की स्थिति देखकर ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते मरम्मत या नए भवन की व्यवस्था नहीं की गई तो बारिश, तेज हवा या किसी अन्य कारण से भवन का कोई हिस्सा गिर सकता है। ऐसे में विद्यार्थियों और शिक्षकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

एक हॉल में कक्षा 1 से 8 तक की पढ़ाई

शासकीय बालक माध्यमिक शाला भारकच्छ कला में कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों की पढ़ाई संचालित होती है। विद्यालय में पर्याप्त कक्ष उपलब्ध नहीं होने के कारण प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं को दो अलग-अलग पारियों में संचालित करना पड़ रहा है।

सुबह की पारी में कक्षा 1 से 5 तक के लगभग 75 विद्यार्थी पढ़ाई करते हैं। वहीं दोपहर की पारी में कक्षा 6 से 8 तक के लगभग 64 विद्यार्थियों की कक्षाएं लगती हैं। इस तरह विद्यालय में बड़ी संख्या में बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन उनके लिए पर्याप्त और सुरक्षित कक्षों की व्यवस्था नहीं है।

एक ही हॉल में कई कक्षाओं की व्यवस्था किए जाने से शिक्षकों के सामने भी पढ़ाने की चुनौती बनी रहती है। बच्चों को उनकी कक्षा के अनुरूप शांत और व्यवस्थित वातावरण नहीं मिल पा रहा है। इससे पढ़ाई प्रभावित होने के साथ-साथ विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है।

जर्जर भवन में ही चल रहा कार्यालय

विद्यालय की समस्या सिर्फ कक्षाओं तक सीमित नहीं है। स्कूल का कार्यालय भी इसी जर्जर भवन में संचालित हो रहा है। शिक्षक और कर्मचारी प्रतिदिन इसी भवन में बैठकर विभागीय और शैक्षणिक कार्य करते हैं।

दीवारों की हालत खराब होने और छत से टूट-फूट का खतरा बने रहने के कारण कार्यालय में काम करना भी जोखिम से खाली नहीं है। विद्यालय में आने वाले अभिभावकों और ग्रामीणों के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भवन को वास्तव में असुरक्षित माना जा रहा है तो विद्यार्थियों और शिक्षकों को वहां बैठाकर पढ़ाई क्यों कराई जा रही है? जब तक नए भवन का निर्माण नहीं होता, तब तक वैकल्पिक सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी प्रशासन और शिक्षा विभाग की बनती है।

बच्चों की सुरक्षा पर उठ रहे सवाल

विद्यालय में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे छोटी उम्र के हैं। ऐसे में जर्जर भवन में उनकी मौजूदगी को लेकर अभिभावकों की चिंता स्वाभाविक है। बच्चों को स्कूल भेजने के बाद अभिभावकों के मन में यह सवाल बना रहता है कि कहीं अचानक भवन का कोई हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर न गिर जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि किसी दुर्घटना के बाद राहत और मुआवजे की व्यवस्था करने से बेहतर है कि दुर्घटना होने से पहले ही जरूरी कदम उठाए जाएं। स्कूल भवन की स्थिति यदि खराब है तो संबंधित अधिकारियों को उसका निरीक्षण कराकर तत्काल सुरक्षा व्यवस्था करनी चाहिए।

कई बार उठ चुकी है मरम्मत और नए भवन की मांग

स्थानीय लोगों और विद्यालय स्टाफ की ओर से भवन की मरम्मत अथवा नवीन भवन निर्माण की मांग कई बार उठाई जा चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय बच्चों के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण संस्थान है। ऐसे में वहां सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

लोगों का आरोप है कि समस्या लंबे समय से सामने होने के बावजूद अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। यदि भवन की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है तो केवल औपचारिक निरीक्षण से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए वास्तविक स्तर पर निर्माण, मरम्मत या वैकल्पिक भवन की व्यवस्था करनी होगी।

पढ़ाई के साथ बच्चों की मानसिक परेशानी भी बढ़ने की आशंका

विद्यालय का वातावरण बच्चों की पढ़ाई के लिए महत्वपूर्ण होता है। जब विद्यार्थी लगातार खराब भवन, टूटी दीवारों और असुरक्षित छत के बीच पढ़ते हैं तो उनका ध्यान पढ़ाई से हटकर सुरक्षा की चिंता की ओर जा सकता है।

इसके अलावा एक ही हॉल में सीमित संसाधनों के साथ अलग-अलग कक्षाओं का संचालन होने से शिक्षक भी बच्चों को पर्याप्त समय और ध्यान नहीं दे पाते। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है।

कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों के लिए अलग-अलग कक्ष उपलब्ध होना जरूरी है, ताकि प्रत्येक कक्षा में शिक्षक विद्यार्थियों पर पर्याप्त ध्यान दे सकें और बच्चे भी बेहतर तरीके से पढ़ाई कर सकें।

बारिश के मौसम में खतरा और बढ़ सकता है

जर्जर भवन की समस्या बारिश के दौरान और गंभीर हो सकती है। लगातार बारिश होने पर पुरानी दीवारों और छत पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। यदि पहले से ही भवन में दरारें और टूट-फूट मौजूद हैं तो पानी के कारण स्थिति और खराब होने की आशंका रहती है।

ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित अधिकारी विद्यालय भवन का तत्काल तकनीकी निरीक्षण कराएं। यदि भवन असुरक्षित पाया जाता है तो बच्चों की कक्षाएं किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित की जाएं। साथ ही नए भवन के निर्माण अथवा आवश्यक मरम्मत की प्रक्रिया को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जाए।

प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग

ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के साथ उनकी जान की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। शिक्षा केवल किताब और कक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना भी शिक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा है।

स्थानीय लोगों ने प्रशासन और शिक्षा विभाग से मांग की है कि विद्यालय भवन की स्थिति का तत्काल जायजा लिया जाए। भवन की मरम्मत संभव है तो शीघ्र मरम्मत कराई जाए और यदि भवन पूरी तरह अनुपयोगी हो चुका है तो नए भवन का निर्माण कराया जाए।

इसके साथ ही जब तक स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक बच्चों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था किए जाने की मांग भी उठ रही है।

हादसे का इंतजार क्यों?

भारकच्छ कला के इस विद्यालय की स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। जब भवन की दीवारें क्षतिग्रस्त हैं, छत से खतरा बना हुआ है और पर्याप्त कक्ष उपलब्ध नहीं हैं, तो फिर बच्चों की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे?

प्रशासन के सामने सबसे अहम चुनौती यही है कि किसी दुर्घटना का इंतजार किए बिना समस्या का समाधान किया जाए। स्कूल भवन में यदि खतरा है तो उसका आकलन और आवश्यक कार्रवाई तुरंत होनी चाहिए।

ग्रामीणों की नाराजगी का मुख्य कारण भी यही है कि समस्या सामने होने के बावजूद अभी तक स्थायी समाधान दिखाई नहीं दे रहा है। उनका कहना है कि बच्चों की सुरक्षा किसी भी स्थिति में लापरवाही का विषय नहीं हो सकती।

अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग और प्रशासन भारकच्छ कला के शासकीय विद्यालय की इस गंभीर समस्या को कितनी जल्दी संज्ञान में लेते हैं। क्या जर्जर भवन की मरम्मत कराई जाएगी, नया भवन बनाया जाएगा या बच्चों को सुरक्षित वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाएगा—यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है कि कार्रवाई हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले होनी चाहिए।