एमपी सरकार के खजाने से ₹600 करोड़ की सेंधमारी: सरकारी रकम निजी खातों में पहुंची, प्रॉपर्टी और सट्टे में इस्तेमाल के आरोप
मध्यप्रदेश में सरकारी खजाने में सेंधमारी का एक बेहद संगीन और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जहां एक ओर राज्य सरकार वित्तीय अनुशासन लागू करने के लिए मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों की विदेश यात्राओं तथा महंगे होटलों के आयोजनों पर सख्ती से रोक लगा रही है।
24 विभागों में 600 करोड़ की वित्तीय गड़बड़ी का खुलासा, 59 FIR दर्ज; 400 से ज्यादा अधिकारी-कर्मचारी जांच के घेरे में
निजी और रिश्तेदारों के खातों में पहुंचाए 305 करोड़, नियमों को दरकिनार कर 293 करोड़ व्यावसायिक खातों में ट्रांसफर
भोपाल। मध्य प्रदेश में सरकारी खजाने से जुड़े एक बड़े वित्तीय घपले ने प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य के 24 सरकारी विभागों में पिछले पांच वर्षों के दौरान करीब 600 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता और गबन सामने आने का दावा किया गया है। जांच में सरकारी धन को अधिकारियों-कर्मचारियों और उनके परिजनों के निजी बैंक खातों में भेजने से लेकर नियमों के विपरीत व्यावसायिक बैंक खातों में रकम ट्रांसफर करने तक के मामले सामने आए हैं।
यह मामला राज्य सरकार के करीब 4.50 लाख करोड़ रुपये के बजट भुगतान को नियंत्रित करने वाले इंटीग्रेटेड फाइनेंशियल मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (IFMIS) की कार्यप्रणाली से जुड़ा है। कोष एवं लेखा संचालनालय की स्टेट फाइनेंशियल इंटेलिजेंस सेल की जांच में वित्तीय लेनदेन के कई संदिग्ध पैटर्न सामने आने के बाद मामले की गंभीरता बढ़ गई है।
24 विभागों में मिली गड़बड़ी, 59 एफआईआर दर्ज
जांच के दौरान प्रदेश के 24 सरकारी विभागों में वित्तीय गड़बड़ियां सामने आने की बात कही गई है। अब तक 59 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं और 400 से अधिक अधिकारी-कर्मचारी तथा अन्य लोग जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं।
मामले की व्यापकता को देखते हुए आर्थिक अपराध शाखा (EOW) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी एजेंसियों की जांच भी महत्वपूर्ण हो गई है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि सरकारी रकम किन-किन खातों में गई, उसके बाद उसका इस्तेमाल कहां किया गया और इस पूरी प्रक्रिया में कितने लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे।
निजी खातों में पहुंचाए गए 305 करोड़ रुपये
जांच में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक करीब 305 करोड़ रुपये के 199 संदिग्ध लेनदेन ऐसे पाए गए, जिनमें सरकारी धन अधिकारियों-कर्मचारियों अथवा उनके परिवार के सदस्यों के निजी बैंक खातों में पहुंचाया गया।
इनमें पत्नी और अन्य रिश्तेदारों के बैंक खातों का इस्तेमाल किए जाने का भी दावा किया गया है। जांच का सबसे अहम पहलू यही है कि सरकारी बजट से निकली रकम आखिर किस प्रक्रिया के तहत निजी खातों तक पहुंची और संबंधित भुगतान को सिस्टम में किस आधार पर मंजूरी मिली।
अगर जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह सरकारी वित्तीय नियंत्रण व्यवस्था में गंभीर चूक का मामला होगा।
नियमों के विपरीत बैंक खातों में 293 करोड़
सरकारी धन के इस्तेमाल का दूसरा बड़ा पैटर्न भी जांच में सामने आया है। नियमों के मुताबिक कुछ सरकारी रकम को ट्रेजरी के पर्सनल डिपॉजिट खातों में रखा जाना चाहिए था, लेकिन करीब 293 करोड़ रुपये नियमों के विपरीत व्यावसायिक बैंक खातों में ट्रांसफर किए जाने की बात सामने आई है।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगा रही हैं कि इन खातों का संचालन कौन कर रहा था और रकम को ट्रेजरी व्यवस्था से बाहर भेजने की अनुमति किस स्तर पर दी गई।
दो एम्प्लाय कोड बनाकर भुगतान में गड़बड़ी
जांच में एक कर्मचारी के नाम पर दो अलग-अलग एम्प्लाय कोड बनाए जाने की बात भी सामने आई है। इस व्यवस्था का कथित तौर पर इस्तेमाल एक ही व्यक्ति के नाम पर दोहरी भुगतान प्रक्रिया चलाने के लिए किया गया।
वित्तीय सिस्टम में कर्मचारी की पहचान से जुड़ा कोड बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में एक ही कर्मचारी के लिए अलग-अलग कोड तैयार होना सिस्टम की निगरानी और डेटा सत्यापन व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
आईडी-पासवर्ड साझा करने से खुला रास्ता
घोटाले में सिस्टम के लॉगइन और पासवर्ड की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा बनकर सामने आई है। जांच में कई आहरण एवं संवितरण अधिकारियों द्वारा अपने गोपनीय लॉगइन क्रेडेंशियल और पासवर्ड अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ साझा किए जाने की बात सामने आई है।
इसका फायदा उठाकर सिस्टम में भुगतान संबंधी गतिविधियां किए जाने की आशंका है। वित्तीय व्यवस्था में लॉगइन क्रेडेंशियल किसी अधिकारी की डिजिटल पहचान की तरह काम करते हैं। ऐसे में पासवर्ड साझा होने से किसी भी अनधिकृत व्यक्ति के लिए भुगतान प्रक्रिया में हस्तक्षेप का रास्ता खुल सकता है।
मोबाइल नंबर बदले, ओटीपी पर भी उठे सवाल
जांच में सिस्टम में दर्ज अधिकृत कर्मचारियों के मोबाइल नंबरों में बदलाव किए जाने का भी मामला सामने आया है। आरोप है कि कुछ मामलों में अधिकृत अधिकारी के मोबाइल नंबर की जगह दूसरे नंबर दर्ज कर दिए गए, जिससे भुगतान से जुड़े ओटीपी और अन्य सत्यापन संदेश वास्तविक अधिकारी के बजाय दूसरे लोगों तक पहुंच सकें।
यदि यह व्यवस्था जानबूझकर बनाई गई थी तो यह डिजिटल वित्तीय सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर सेंध मानी जाएगी।
सर्विस रिकॉर्ड और बैंक खाते के बीच क्रॉस-वेरिफिकेशन की कमी
जांच में यह भी सामने आया कि कर्मचारी के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज नाम और भुगतान प्राप्त करने वाले बैंक खाते के नाम के बीच पर्याप्त क्रॉस-वेरिफिकेशन की व्यवस्था नहीं थी।
इसी कथित सिस्टम कमजोरी का फायदा उठाकर सरकारी भुगतान ऐसे बैंक खातों में पहुंचाए जाने की आशंका है, जिनका वास्तविक लाभार्थी से सीधा संबंध नहीं था। इससे सरकारी भुगतान प्रणाली में आधारभूत डेटा सत्यापन की जरूरत और बढ़ जाती है।
प्रॉपर्टी खरीदने से लेकर जुए-सट्टे तक इस्तेमाल का आरोप
गबन की गई रकम के इस्तेमाल को लेकर भी जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आने का दावा किया गया है। आरोपियों ने कथित तौर पर सरकारी रकम का इस्तेमाल महंगी प्रॉपर्टी खरीदने, जुआ खेलने और सट्टे जैसी गतिविधियों में किया।
अब जांच एजेंसियों की नजर उन बैंक खातों, संपत्तियों और वित्तीय लेनदेन पर है, जिनके जरिए कथित तौर पर सरकारी धन को निजी संपत्ति में बदला गया। संपत्तियों और संदिग्ध लेनदेन की जांच से यह भी पता लगाने की कोशिश होगी कि घोटाले की रकम किन लोगों तक पहुंची।
380 करोड़ की रिकवरी बाकी, 220 करोड़ वापस
उपलब्ध जांच आंकड़ों के मुताबिक करीब 380 करोड़ रुपये की रिकवरी अभी बकाया बताई गई है, जबकि लगभग 220 करोड़ रुपये की रिकवरी किए जाने की जानकारी सामने आई है।
रिकवरी की प्रक्रिया के साथ जांच एजेंसियां यह भी देख रही हैं कि सरकारी धन की निकासी से लेकर उसके अंतिम इस्तेमाल तक कौन-कौन से अधिकारी, कर्मचारी, बैंक खाते और निजी संस्थाएं इस नेटवर्क से जुड़ी थीं।
सिस्टम की कमियों ने बढ़ाई चुनौती
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि कथित घोटाले के लिए केवल किसी एक अधिकारी की लापरवाही जिम्मेदार नहीं दिखाई देती, बल्कि जांच में सिस्टम की कई कमजोरियां सामने आने का दावा है।
दोहरे कर्मचारी कोड, पासवर्ड साझा करना, मोबाइल नंबर बदलना, बैंक खातों का पर्याप्त सत्यापन नहीं होना और भुगतान प्रक्रिया में नियंत्रण की कमी जैसे बिंदु बताते हैं कि वित्तीय सिस्टम में कई स्तरों पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है।
अब जिम्मेदारी तय करने की चुनौती
करीब 600 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर सरकारी धन की हेराफेरी लंबे समय तक कैसे चलती रही। 24 विभागों में गड़बड़ी और 400 से अधिक लोगों के जांच के दायरे में आने से मामला और गंभीर हो गया है।
अब जांच एजेंसियों के सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं—पहली, सरकारी धन की पूरी रिकवरी और दूसरी, पूरे नेटवर्क में शामिल वास्तविक जिम्मेदार लोगों की पहचान।
जांच आगे बढ़ने के साथ यह भी स्पष्ट होगा कि यह केवल वित्तीय सिस्टम की तकनीकी खामी थी या फिर इन खामियों का जानबूझकर इस्तेमाल कर संगठित तरीके से सरकारी धन को निजी खातों तक पहुंचाया गया।
फिलहाल 59 एफआईआर, 24 विभागों में गड़बड़ी और सैकड़ों अधिकारियों-कर्मचारियों की जांच ने मध्य प्रदेश की वित्तीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार और जांच एजेंसियों के सामने अब यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और सरकारी खजाने की एक-एक रकम का हिसाब तय हो।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस