मैं तत्काल प्रभाव से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देता हूं- दिपके का तंज, बोले- मौका देने के लिए PM मोदी का धन्यवाद; बालाघाट के बच्चों के इलाज में विफल रहा, स्कूलों की हालत भी बदतर
बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत के मामले पर पहुंचे अभिजीत दीपके का विरोध हुआ। कथित सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स ने सवाल पूछे। दीपके ने सीएम पद से इस्तीफे वाला व्यंग्यात्मक पोस्ट किया।
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक ने व्यंग्य में खुद को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बताते हुए राज्यपाल को इस्तीफा देने की बात कही; सोशल मीडिया यूजर्स ने फर्जी पहचान और लेटरहेड के इस्तेमाल का आरोप लगाकर कार्रवाई की मांग की
बालाघाट में 30 से ज्यादा आदिवासी बच्चों की मौत का हवाला देते हुए CJP फाउंडर अभिजीत दिपके ने CM पद से इस्तीफे का व्यंग्यात्मक पत्र जारी किया। उन्होंने चिकित्सा व्यवस्था, मुआवजे, पेयजल और स्कूलों की बदहाली को लेकर सरकार पर तीखे सवाल उठाए।
दिपके ने खुद को बताया मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री
मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दिपके ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का एक व्यंग्यात्मक पत्र सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है। राज्यपाल मंगूभाई पटेल के नाम लिखे इस पत्र में उन्होंने खुद को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बताते हुए तत्काल प्रभाव से पद छोड़ने की बात कही है।
13 अगस्त 2026 को लिखे गए इस पत्र और सोशल मीडिया पोस्ट में दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी टैग किया। उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की जनता की सेवा करने का अवसर देने के लिए प्रधानमंत्री का धन्यवाद किया, लेकिन साथ ही बालाघाट में बच्चों की मौतों को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
‘मैं तत्काल प्रभाव से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देता हूं’
दिपके ने अपनी अंग्रेजी पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए लिखा कि वह तत्काल प्रभाव से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि उन्हें प्रदेश की जनता की सेवा करने का मौका मिला, लेकिन वह इस जिम्मेदारी में स्पष्ट रूप से विफल रहे।
उनके मुताबिक, बालाघाट में 30 से ज्यादा आदिवासी बच्चों की मौत के बाद उनका विवेक उन्हें मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने की अनुमति नहीं देता। उन्होंने बच्चों को समय पर आवश्यक चिकित्सा सुविधा और सहायता उपलब्ध नहीं करा पाने को अपनी कथित विफलता बताया।
दिपके ने कहा कि इनमें से कई बच्चों की जान बचाई जा सकती थी और ऐसी स्थिति में जिम्मेदारी से बचना संभव नहीं है। हालांकि उनका पूरा पत्र सरकार की व्यवस्था पर राजनीतिक और व्यंग्यात्मक हमला माना जा रहा है।
30 से ज्यादा बच्चों की मौत का हवाला
अभिजीत दिपके ने अपने पत्र में बालाघाट के आदिवासी इलाकों में बीते दो महीनों के दौरान 30 से ज्यादा बच्चों की मौत का संदर्भ दिया है। उन्होंने इन मौतों के पीछे स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने कहा कि प्रभावित परिवारों तक समय पर इलाज और जरूरी सहायता पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी है। उनके मुताबिक, अगर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होती और जरूरत के समय बच्चों को उपचार उपलब्ध होता, तो कई जानें बचाई जा सकती थीं।
दिपके ने इस पूरे मामले में प्रशासन की जवाबदेही तय करने की मांग भी की है।
मुआवजे को लेकर सरकार पर तीखा हमला
दिपके ने बच्चों की मौत के बाद घोषित मुआवजे को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। पत्र में उन्होंने दावा किया कि शुरुआत में प्रत्येक मृत बच्चे के परिवार को 2 लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा की गई थी। इसके बाद आदिवासी समुदाय के विरोध के बीच मुआवजे की राशि बढ़ाकर 4 लाख रुपये किए जाने का जिक्र किया।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि इन बच्चों में से किसी के परिवार का संबंध किसी मंत्री या विधायक से होता, तो क्या 4 लाख रुपये का मुआवजा पर्याप्त माना जाता?
दिपके के मुताबिक, सरकार की ओर से की गई सहायता की राशि और प्रतिक्रिया से यह सवाल उठता है कि आदिवासी बच्चों के जीवन को व्यवस्था में कितना महत्व दिया जा रहा है।
‘हर घर नल’ के दावे के बीच नदी का पानी पीने को मजबूर परिवार
CJP फाउंडर ने केवल स्वास्थ्य व्यवस्था ही नहीं, बल्कि बालाघाट के आदिवासी इलाकों में पेयजल व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने अपने पत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘हर घर नल योजना’ का उल्लेख करते हुए कहा कि योजना की सफलता के दावों के बावजूद बालाघाट के कुछ इलाकों में आदिवासी परिवार अभी भी पीने के पानी के लिए नदी पर निर्भर हैं।
उनका आरोप है कि दूषित या असुरक्षित पानी का इस्तेमाल ग्रामीणों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जरूरत बताई।
स्कूलों की हालत पर भी उठाए सवाल
दिपके ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी सरकार पर सवाल खड़े किए। उन्होंने दावा किया कि बालाघाट के कई गांवों में स्कूलों की स्थिति बेहद खराब है और कुछ जगहों पर स्कूल भवनों की हालत पशु आश्रयों से भी बदतर है।
पत्र में उन्होंने एक ऐसे स्कूल का उल्लेख किया, जहां आंगनबाड़ी से लेकर कक्षा 5 तक के करीब 75 बच्चों के लिए केवल एक कमरा उपलब्ध होने की बात कही गई है। उनके अनुसार, स्थानीय आदिवासी समुदाय लंबे समय से बेहतर स्कूल भवन की मांग करता रहा है, लेकिन उनकी मांगों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई।
दिपके का कहना है कि बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े इन मुद्दों को केवल घोषणाओं से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए जमीनी स्तर पर स्थायी व्यवस्था बनाने की जरूरत है।
पांच गांवों में पहुंचकर ग्रामीणों से की मुलाकात
दरअसल, CJP के फाउंडर अभिजीत दिपके शनिवार को बालाघाट पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने उन इलाकों का दौरा किया, जहां पिछले दो महीनों में 30 से ज्यादा आदिवासी बच्चों की मौत होने की बात सामने आई है।
दिपके ने कुंडेकसा, बोंदारी, कोरका, कोडबीरकोना और घाघाटोला गांवों में पहुंचकर स्थानीय लोगों से मुलाकात की। उन्होंने प्रभावित परिवारों से बातचीत कर बच्चों की मौत से जुड़ी परिस्थितियों और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति के बारे में जानकारी जुटाई।
ग्रामीणों से बातचीत के दौरान उन्होंने अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल और स्कूलों से जुड़ी समस्याओं को समझने का प्रयास किया। इसके बाद उन्होंने प्रशासन की जवाबदेही तय किए जाने की मांग उठाई।
सरकार की जवाबदेही पर केंद्रित है दिपके का हमला
अभिजीत दिपके का यह पत्र सीधे तौर पर सरकार की जवाबदेही को केंद्र में रखता है। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे का पत्र लिखकर व्यंग्यात्मक तरीके से यह सवाल उठाया कि यदि किसी सरकार के कार्यकाल में इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौत होती है और प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य, पानी तथा शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं की स्थिति खराब रहती है, तो जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए।
उनका कहना है कि आदिवासी इलाकों में रहने वाले परिवार भी प्रदेश के समान नागरिक हैं और उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सेवा, सुरक्षित पेयजल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक सहायता का अधिकार है।
बालाघाट के इस मामले ने एक बार फिर दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर बहस तेज कर दी है। दिपके के दौरे और उनके इस्तीफे वाले पत्र ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग भी दे दिया है। अब इस मामले में प्रशासन और सरकार की ओर से बच्चों की मौत के वास्तविक कारणों, स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रभावित परिवारों को दी जा रही सहायता को लेकर क्या जवाब सामने आता है, इस पर नजर रहेगी।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस