UPI पर शुल्क लगाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, अंतरिम रोक से इनकार; केंद्र-RBI-NPCI को नोटिस
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने UPI ट्रांजैक्शन पर फीस वसूलने के मामले में केंद्र सरकार, यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी, एनपीसीआई समेत अन्य को नोटिस जारी कर 4 हफ्तों में जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर शुल्क (एमडीआर) लगाने के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार, आरबीआई और एनपीसीाअई को नोटिस जारी कर हलफनामा मांगा है। जानिए इस फैसले का आप पर क्या असर पड़ेगा।
नई दिल्ली। यूपीआई के जरिए किए जाने वाले चुनिंदा बड़े मर्चेंट भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सोमवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए याचिका स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। पीठ ने सरकार से इस शुल्क की कानूनी प्रकृति और इसके आधार को स्पष्ट करने के लिए जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा है। सरकार को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा। यह जनहित याचिका अधिवक्ता अंजन दत्ता की ओर से दायर की गई है।
15 अक्टूबर से लागू होना है नया MDR सिस्टम
केंद्र सरकार की ओर से घोषित नए ढांचे के अनुसार, 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के कुछ व्यक्ति-से-व्यापारी यानी P2M UPI लेन-देन पर MDR लागू किया जाना है। सामान्य श्रेणी में यह दर 0.4 प्रतिशत निर्धारित की गई है। ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन पर प्रति लेन-देन अधिकतम MDR ₹300 रहेगा।
हालांकि, इस व्यवस्था का मतलब यह नहीं है कि हर UPI भुगतान पर उपभोक्ता से शुल्क लिया जाएगा। व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी P2P भुगतान इस व्यवस्था से बाहर रहेंगे। इसी तरह ₹2,000 तक के पात्र मर्चेंट भुगतान पर MDR शून्य रहेगा।
याचिकाकर्ता ने क्या उठाए सवाल?
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में नए शुल्क ढांचे की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि UPI को लंबे समय से डिजिटल भुगतान के कम लागत वाले माध्यम के रूप में बढ़ावा दिया गया है। ऐसे में बड़े व्यापारिक लेन-देन पर MDR लगाने से इसकी लागत का असर कारोबारियों और आगे चलकर उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि ₹2,000 की सीमा और छोटे व्यापारियों के लिए ₹1 लाख मासिक प्राप्ति की सीमा तय करने का आधार क्या है। याचिकाकर्ता ने सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए इसे रोकने और संबंधित प्रावधानों पर न्यायिक जांच की मांग की है।
सरकार ने कहा- यह टैक्स या सरकारी शुल्क नहीं
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने अदालत के सामने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित MDR को सरकारी टैक्स या सरकारी शुल्क के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
सरकार की ओर से कहा गया कि यह भुगतान व्यवस्था में शामिल बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और अन्य संस्थाओं के बीच सेटलमेंट से जुड़ा शुल्क है। इसका पूरा पैसा सरकार के खाते में नहीं जाता। सरकार ने यह भी बताया कि नई व्यवस्था 15 अक्टूबर से प्रभावी होनी है।
अदालत ने इस व्यवस्था के कानूनी आधार को लेकर सवाल उठाए और सरकार को निर्देश दिया कि वह अपने जवाबी हलफनामे में संबंधित तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को स्पष्ट करे।
आम UPI यूजर्स पर क्या पड़ेगा असर?
नए MDR को लेकर सबसे बड़ा सवाल आम UPI यूजर्स के बीच यही है कि क्या 15 अक्टूबर के बाद हर भुगतान पर अतिरिक्त पैसा देना पड़ेगा। उपलब्ध नियमों के मुताबिक ऐसा नहीं है।
व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले UPI ट्रांजैक्शन पर MDR नहीं लगाया जाएगा। यानी किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के बैंक खाते में पैसा भेजने पर यह शुल्क लागू नहीं होगा।
इसके अलावा ₹2,000 तक के पात्र मर्चेंट भुगतान भी MDR से बाहर रखे गए हैं। इसका मतलब है कि रोजमर्रा की छोटी खरीदारी करने वाले अधिकांश UPI यूजर्स पर सीधे तौर पर नया MDR लागू नहीं होगा।
छोटे व्यापारियों को भी राहत
नए ढांचे में छोटे कारोबारियों के लिए भी छूट का प्रावधान किया गया है। जिन छोटे व्यापारियों को QR कोड के जरिए प्रति माह ₹1 लाख तक की UPI प्राप्तियां होती हैं, वे निर्धारित शर्तों के तहत MDR से बाहर रहेंगे।
इस व्यवस्था का उद्देश्य छोटे दुकानदारों और कम मात्रा में डिजिटल भुगतान लेने वाले कारोबारियों पर अतिरिक्त लागत का बोझ न डालना बताया गया है।
रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार और भुगतान क्षेत्र से जुड़े पक्षों का कहना है कि नए शुल्क ढांचे से मर्चेंट लेन-देन के बड़े हिस्से पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार की ओर से अदालत में करीब 96 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं के प्रभावित न होने की बात भी कही गई।
सामान्य मर्चेंट भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR
₹2,000 से अधिक के सामान्य P2M UPI लेन-देन के लिए 0.4 प्रतिशत MDR निर्धारित किया गया है। उदाहरण के तौर पर ₹10,000 के पात्र भुगतान पर MDR ₹40 होगा। इसी तरह ₹50,000 के भुगतान पर यह राशि ₹200 तक होगी।
₹75,000 या उससे अधिक के भुगतान के मामले में MDR की अधिकतम सीमा ₹300 रखी गई है। यानी भुगतान राशि बढ़ने के बावजूद निर्धारित श्रेणी में शुल्क ₹300 से ज्यादा नहीं होगा।
जरूरी सेवाओं के लिए अलग दर
कुछ आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए सामान्य 0.4 प्रतिशत MDR के बजाय अलग व्यवस्था की गई है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे क्षेत्रों में ₹2,000 से अधिक के पात्र लेन-देन पर अधिकतम ₹5 का फ्लैट MDR रखा गया है।
इसके अलावा पूंजी बाजार से जुड़े कुछ भुगतान के लिए 0.02 प्रतिशत की दर निर्धारित की गई है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 है।
क्या व्यापारी यह शुल्क ग्राहक से वसूल सकेंगे?
यह भी इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण पहलू है। सरकार ने बैंकों और UPI से जुड़े सेवा प्रदाताओं के लिए यह व्यवस्था रखी है कि MDR का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर न डाला जाए। यानी मर्चेंट से जुड़े शुल्क को ग्राहक से अलग से UPI चार्ज के नाम पर वसूलने का सवाल महत्वपूर्ण नियामकीय जांच के दायरे में रहेगा।
सरकार ने यह भी कहा है कि UPI ऐप के जरिए उपभोक्ताओं पर छिपे हुए प्लेटफॉर्म शुल्क लगाने की अनुमति नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का फिलहाल क्या मतलब है?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नए MDR ढांचे पर अंतरिम रोक नहीं लगाई है। इसका अर्थ है कि अदालत ने अभी इस व्यवस्था को अंतिम रूप से वैध घोषित नहीं किया है, बल्कि सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
अदालत अब यह देखेगी कि ₹2,000 से अधिक के कुछ UPI मर्चेंट भुगतान पर MDR लगाने के लिए सरकार के पास कौन-सा वैधानिक आधार है और इस व्यवस्था की कानूनी प्रकृति क्या है।
केंद्र सरकार, RBI और NPCI को चार सप्ताह में अपना जवाब दाखिल करना है। इसके बाद मामले की आगे सुनवाई होगी। इसलिए 15 अक्टूबर से लागू होने वाली व्यवस्था की अंतिम न्यायिक स्थिति इस मामले में आगे आने वाले आदेशों पर निर्भर करेगी।
UPI शुल्क विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के सामने
UPI पर MDR लागू करने का फैसला डिजिटल भुगतान व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव है, क्योंकि लंबे समय से UPI के जरिए होने वाले भुगतान को शुल्क-मुक्त डिजिटल भुगतान माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। अब सरकार ने चुनिंदा बड़े मर्चेंट लेन-देन के लिए MDR व्यवस्था लागू करने का फैसला किया है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगाने से इनकार करते हुए सरकार से कानूनी आधार स्पष्ट करने को कहा है। आने वाले चार सप्ताह में केंद्र, RBI और NPCI के जवाब के बाद इस मामले में तस्वीर और साफ हो सकती है। तब तक 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला मौजूदा MDR ढांचा न्यायिक चुनौती के अधीन रहेगा।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस