उरई में 450 करोड़ की 7.26 एकड़ नजूल भूमि के फर्जीवाड़े का खुलासा, कूटरचित दस्तावेजों से सरकारी संपत्ति हथियाने की कोशिश पर FIR
उरई के ग्राम लहरिया में करीब 450 करोड़ रुपये कीमत की 7.26 एकड़ नजूल भूमि को कथित फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के जरिए निजी संपत्ति बनाने के प्रयास का खुलासा हुआ है। जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय के निर्देश पर गठित त्रिसदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर कोतवाली उरई में संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है।
450 करोड़ की सरकारी जमीन पर फर्जीवाड़े का आरोप
7.26 एकड़ नजूल भूमि को निजी बनाने की कोशिश
पुराने दस्तावेजों की जांच में सामने आईं गंभीर विसंगतियां
2014 में खत्म हो चुकी थी भूमि की लीज
उरई। सरकारी जमीन को निजी संपत्ति में बदलने के कथित प्रयास के मामले में जालौन जिला प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। उरई के ग्राम लहरिया में करीब 450 करोड़ रुपये कीमत की 7.26 एकड़ बेशकीमती नजूल भूमि को कथित तौर पर फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के जरिए निजी अधिकार में लेने तथा उसके विक्रय एवं हस्तांतरण का प्रयास किए जाने का मामला सामने आया है। प्रशासनिक जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर कोतवाली उरई में संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई गई है।
प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में जाने से रोकने को महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय के निर्देश पर कराई गई विस्तृत जांच में पुराने राजस्व अभिलेखों, नजूल रजिस्टर, खतौनी और जमीन से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की गई। जांच में भूमि के स्वामित्व और उसके हस्तांतरण से संबंधित कई गंभीर विसंगतियां सामने आने की बात कही गई है।
7.26 एकड़ जमीन पर जांच के बाद खुला मामला
पूरा मामला उरई के ग्राम लहरिया स्थित गाटा संख्या 518, रकबा 7.26 एकड़ नजूल भूमि से जुड़ा है। प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित भूमि मूल रूप से नजूल संपत्ति है और शासकीय अभिलेखों में राज्य सरकार की संपत्ति के रूप में दर्ज है।
अभिलेखों की पड़ताल में सामने आया कि 15 मार्च 1914 को इस भूमि को वार्षिक लीज रेंट जमा करने और आवासीय मकान स्थापित करने की शर्त पर 99 वर्ष के पट्टे पर दिया गया था। पट्टे की शर्तों में यह भी स्पष्ट था कि कलेक्टर की अनुमति के बिना भवन में परिवर्तन नहीं किया जा सकता था। इसके साथ ही भूमि या भवन के मूल उपयोग में बदलाव पर भी रोक थी।
प्रारंभिक अभिलेखों में लीज ए.के. पसन्ना के नाम से दर्ज होने का उल्लेख मिलता है। बाद के दस्तावेजों की जांच में भूमि से जुड़े कई पुराने लेन-देन सामने आए, जिनकी वैधता को लेकर अब प्रशासन ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
1918 में विक्रय का उल्लेख
जांच के दौरान सामने आए दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1918 में ए.के. पसन्ना की पुत्री एलिस पसन्ना द्वारा बी.सी.एच., पूना के पक्ष में भूमि के विक्रय का उल्लेख मिला। इसके बाद बी.सी.एच., पूना के अधिकृत प्रतिनिधि मिस्टर जॉन ई. नॉटन द्वारा 23 सितंबर 1949 को मिस एडेलिन ग्रीगर के पक्ष में विक्रय किए जाने की बात सामने आई।
हालांकि, प्रशासनिक जांच में संबंधित जमीन की लीज की अवधि वर्ष 2014 में समाप्त हो चुकी होने का तथ्य भी सामने आया। इसके बावजूद भूमि पर अधिकार और उससे जुड़े लेन-देन को लेकर दावे किए जाते रहे। यही स्थिति प्रशासनिक जांच में एक महत्वपूर्ण बिंदु बनी।
नजूल और नगर पालिका रिकॉर्ड में नहीं मिला सेल डीड का उल्लेख
जांच के दौरान सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि संबंधित सेल डीड का कलेक्टर उरई के नजूल रजिस्टर और नगर पालिका परिषद उरई के संपत्ति रजिस्टर में कोई उल्लेख नहीं मिला।
प्रशासन के अनुसार जिस भूमि के आधार पर निजी अधिकार और लेन-देन का दावा किया गया, वह सरकारी अभिलेखों में अब भी राज्य सरकार की संपत्ति के रूप में दर्ज है। इस तथ्य ने पूरे मामले को सामान्य भूमि विवाद से अलग कर दिया और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामले के रूप में सामने ला दिया।
अभिलेखों में दर्ज तथ्यों और प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों के बीच अंतर मिलने के बाद जिला प्रशासन ने मामले की विस्तृत जांच कराने का निर्णय लिया।
जिलाधिकारी ने गठित की त्रिसदस्यीय जांच समिति
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय ने 6 मई 2026 और 27 मई 2026 को जारी आदेशों के क्रम में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की अध्यक्षता में त्रिसदस्यीय जांच समिति गठित कराई।
समिति को जमीन से जुड़े सभी पुराने और वर्तमान अभिलेखों की जांच करने की जिम्मेदारी दी गई। समिति ने राजस्व रिकॉर्ड, नजूल रजिस्टर, खतौनी, पुराने दस्तावेजों और अन्य संबंधित अभिलेखों की गहन पड़ताल की।
जांच के दौरान दस्तावेजों की वैधता, भूमि के स्वामित्व, पुराने पट्टे, कथित बिक्री और वर्तमान कब्जे सहित विभिन्न पहलुओं की जांच की गई। समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद मामले में कार्रवाई का रास्ता साफ हुआ।
1953 की डीड को लेकर गंभीर आरोप
जांच समिति की रिपोर्ट में कथित तौर पर यह तथ्य सामने आया कि मूल आवंटी से अलग व्यक्तियों द्वारा वर्ष 1953 में एक डीड तैयार की गई और नजूल भूमि को आर्थिक लाभ के उद्देश्य से फर्जी एवं कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर अवैधानिक तरीके से विक्रय किए जाने का प्रयास किया गया।
जांच रिपोर्ट में इन दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट आदि के निर्माण का भी उल्लेख किया गया है। प्रशासन ने इसे सरकारी संपत्ति पर निजी अधिकार स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि उपलब्ध शासकीय अभिलेखों के अनुसार संबंधित भूमि राज्य सरकार की संपत्ति है। इसके बावजूद यदि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर निजी स्वामित्व या हस्तांतरण का दावा किया गया है तो उसकी कानूनी जांच और कार्रवाई आवश्यक है।
जांच रिपोर्ट के आधार पर दर्ज कराई गई FIR
प्रशासनिक जांच पूरी होने के बाद कार्रवाई के लिए विभिन्न दस्तावेजों को आधार बनाया गया। इनमें उद्धरण खतौनी, जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेश पत्रांक 1082/25-एल.वी.ओ. दिनांक 28 जुलाई 2026 और जांच आख्या दिनांक 8 जुलाई 2026 सहित अन्य संबंधित अभिलेख शामिल हैं।
इसके बाद नगर पालिका परिषद उरई के अधिशासी अधिकारी रामअचल कुरील ने प्रभारी निरीक्षक, कोतवाली उरई को पत्र भेजकर संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई।
एफआईआर दर्ज होने के बाद अब मामले में पुलिस स्तर पर दस्तावेजों और आरोपों की जांच की जाएगी। संबंधित लोगों से पूछताछ और उपलब्ध अभिलेखों की वैधानिक जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
वर्तमान कब्जेदार और अन्य लोग जांच के दायरे में
मामले में वर्तमान कब्जेदार बेथनी क्रिश्चियन होम्स मिशन/बी.सी.एच. मिशन की प्रबंधक किरन के मसीह, निवासी पटेल नगर, उरई, संस्था से जुड़े अन्य व्यक्तियों तथा नजूल भूमि की कथित खरीद-फरोख्त में शामिल बताए गए व्यक्तियों और संस्थाओं को कार्रवाई के दायरे में लिया गया है।
आरोप है कि कथित फर्जी लीज डीड और कूटरचित दस्तावेजों के सहारे सरकारी जमीन पर निजी अधिकार स्थापित करने, उसे बेचने या हस्तांतरित करने और उससे आर्थिक लाभ अर्जित करने का प्रयास किया गया।
हालांकि, एफआईआर में लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी। पुलिस द्वारा मामले से जुड़े दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच की जाएगी।
450 करोड़ की सरकारी संपत्ति बचाने की बड़ी कार्रवाई
इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम पहलू जमीन की कीमत और उसका क्षेत्रफल है। प्रशासन के अनुसार करीब 7.26 एकड़ भूमि की अनुमानित कीमत 450 करोड़ रुपये है। इतनी बड़ी सरकारी संपत्ति पर निजी अधिकार स्थापित करने की कोशिश का मामला सामने आने के बाद प्रशासन की कार्रवाई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यदि समय रहते राजस्व और नजूल अभिलेखों की गंभीरता से जांच नहीं होती तो भूमि से जुड़े दावे और अधिक जटिल हो सकते थे। पुराने दस्तावेजों के आधार पर स्वामित्व और हस्तांतरण के दावों को आगे बढ़ाए जाने से सरकारी संपत्ति पर लंबे समय तक विवाद की स्थिति पैदा हो सकती थी।
जिलाधिकारी के निर्देश पर गठित जांच समिति ने पुराने रिकॉर्ड को खंगालकर जमीन की स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया। जांच के बाद एफआईआर दर्ज होने से अब इस मामले में पुलिस जांच के साथ-साथ दस्तावेजों की वैधानिकता भी जांच के दायरे में आ गई है।
सरकारी जमीन पर प्रशासन का सख्त रुख
इस कार्रवाई से जिला प्रशासन ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में अभिलेखों के साथ किसी भी तरह की कथित हेराफेरी को गंभीरता से लिया जाएगा। विशेष रूप से नजूल भूमि पर निजी अधिकार स्थापित करने के लिए यदि फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
उरई के लहरिया गांव की यह जमीन अब प्रशासनिक और पुलिस जांच के केंद्र में है। आने वाले समय में जांच के दौरान सामने आने वाले दस्तावेज और साक्ष्य यह तय करेंगे कि कथित फर्जीवाड़े में कौन-कौन लोग शामिल थे और सरकारी भूमि को निजी संपत्ति के रूप में प्रस्तुत करने के पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या था।
फिलहाल करीब 450 करोड़ रुपये मूल्य की 7.26 एकड़ नजूल भूमि से जुड़े इस मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद प्रशासन और पुलिस दोनों की कार्रवाई आगे बढ़ेगी। सरकारी अभिलेखों में भूमि के राज्य सरकार की संपत्ति होने के तथ्य के बीच निजी अधिकार और पुराने दस्तावेजों के दावों की जांच अब पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस