सरकारी सीमेंट की खुलेआम बिक्री का आरोप, रिक्शों से घर-घर पहुंच रही ‘पुनः बिक्री निषेध’ लिखी बोरियां
उरई में सरकारी सीमेंट की कथित अवैध बिक्री का मामला सामने आया है। ‘पुनः बिक्री निषेध’ लिखी सीमेंट की बोरियां रिक्शों के जरिए घर-घर पहुंचाए जाने का आरोप है। स्थानीय लोगों ने सरकारी सामग्री के दुरुपयोग की आशंका जताते हुए जांच की मांग की है।
‘पुनः बिक्री निषेध’ लिखी बोरियां निजी घरों तक पहुंचने का आरोप
रिक्शों से खुलेआम सीमेंट ढोने की तस्वीरों से उठे सवाल
सरकारी निर्माण के लिए आई सीमेंट निजी लोगों को बेचने का आरोप
उरई। जालौन नगर में सरकारी निर्माण कार्यों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली सीमेंट की कथित अवैध बिक्री का मामला सामने आने के बाद सरकारी सामग्री की निगरानी और वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि जिन सीमेंट की बोरियों पर साफ तौर पर ‘पुनः बिक्री निषेध’ अंकित है, वही बोरियां कथित रूप से निजी लोगों को बेची जा रही हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि रिक्शों के जरिए इन बोरियों को नगर के अलग-अलग इलाकों में ले जाकर घर-घर तक पहुंचाया जा रहा है।
मामला सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर चर्चाओं का बाजार गर्म है। नागरिकों का कहना है कि यदि यह सीमेंट वास्तव में सरकारी योजनाओं अथवा किसी सरकारी निर्माण परियोजना के लिए उपलब्ध कराया गया था, तो फिर इसकी निजी स्तर पर बिक्री कैसे हो रही है? वहीं यदि किसी स्तर पर सरकारी सीमेंट के स्टॉक का दुरुपयोग हुआ है तो इसकी जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी है।
रिक्शों से ढोई जा रही सीमेंट की बोरियां
स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले कुछ समय से नगर के विभिन्न मोहल्लों में रिक्शों पर सीमेंट की बोरियां ले जाते हुए लोगों को देखा जा रहा है। आरोप है कि इन बोरियों पर सरकारी आपूर्ति से संबंधित पहचान और ‘पुनः बिक्री निषेध’ जैसी स्पष्ट चेतावनी अंकित है। इसके बावजूद कथित तौर पर इन्हें निजी निर्माण कार्यों के लिए लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है।
लोगों का कहना है कि यदि सीमेंट सामान्य बाजार में बिकने वाली सामग्री होती तो उस पर इस तरह की चेतावनी अंकित होने का सवाल ही नहीं उठता। ऐसे में सरकारी चिन्ह वाली सीमेंट की बोरियां निजी घरों तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक हो जाती है।
सरकारी सामग्री निजी हाथों तक कैसे पहुंची?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी सीमेंट निजी उपभोक्ताओं तक पहुंची कैसे? सरकारी योजनाओं में इस्तेमाल होने वाली निर्माण सामग्री के लिए आम तौर पर आपूर्ति, भंडारण और वितरण का रिकॉर्ड रखा जाता है। सीमेंट की कितनी बोरियां आईं, किस संस्था या विभाग को मिलीं, कहां स्टोर की गईं और किस निर्माण कार्य में कितनी मात्रा में इस्तेमाल हुई—इन सभी का हिसाब संबंधित अभिलेखों में दर्ज होना चाहिए।
ऐसे में यदि सरकारी सीमेंट की बोरियां वास्तव में खुले बाजार में या निजी लोगों को बेची जा रही हैं तो रिकॉर्ड के आधार पर पूरे मामले की कड़ियां जोड़ी जा सकती हैं।
बैच नंबर और स्टॉक रजिस्टर से खुल सकता है राज
स्थानीय नागरिकों ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जांच एजेंसी या संबंधित विभाग यदि सीमेंट की बोरियों पर दर्ज बैच नंबर, निर्माण कंपनी, आपूर्ति की तारीख और अन्य पहचान संबंधी विवरण की जांच करे तो यह पता लगाया जा सकता है कि सीमेंट किस सरकारी आपूर्ति का हिस्सा थी।
इसके साथ ही संबंधित विभाग या संस्था के स्टॉक रजिस्टर, वितरण रजिस्टर, आपूर्ति आदेश, बिल-वाउचर और निर्माण कार्यों से संबंधित रिकॉर्ड की भी जांच की जानी चाहिए। मौके पर मौजूद सरकारी सीमेंट के स्टॉक का मिलान कागजी रिकॉर्ड से कराया जाए तो कथित अनियमितता की तस्वीर सामने आ सकती है।
निर्माण कार्यों के बजाय निजी इस्तेमाल का आरोप
आरोप यह भी है कि सरकारी सीमेंट का इस्तेमाल निर्धारित सरकारी निर्माण कार्यों में किए जाने के बजाय निजी जरूरतों को पूरा करने में किया जा रहा है। यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है तो यह सिर्फ सीमेंट की बिक्री का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी संसाधनों के कथित दुरुपयोग का गंभीर विषय बन सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी योजनाओं के लिए आने वाली सामग्री जनता के पैसे से उपलब्ध कराई जाती है। ऐसे में उसका निर्धारित उद्देश्य के अलावा किसी अन्य काम में इस्तेमाल होना सरकारी व्यवस्था और जनता दोनों के साथ अन्याय माना जाएगा।
जिम्मेदार कौन, यह भी बड़ा सवाल
मामले में यह भी पता लगाया जाना जरूरी है कि सरकारी सीमेंट की निगरानी और वितरण की जिम्मेदारी किस अधिकारी, कर्मचारी, संस्था या एजेंसी की थी। यदि सरकारी स्टॉक किसी गोदाम में रखा गया था तो वहां से कितनी बोरियां निकलीं और किसके आदेश पर निकलीं, इसकी जानकारी भी रिकॉर्ड में होनी चाहिए।
यदि सीमेंट सीधे किसी निर्माण स्थल के लिए भेजी गई थी तो वहां इस्तेमाल हुई मात्रा और बची हुई सामग्री का भी हिसाब होना चाहिए। इसी तरह यदि किसी ठेकेदार या कार्यदायी संस्था को सीमेंट उपलब्ध कराई गई थी तो उससे संबंधित दस्तावेजों की जांच की जानी चाहिए।
खुले बाजार में बिक्री की पुष्टि हुई तो होगी कार्रवाई?
फिलहाल सामने आए आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि बरामद या देखी गई सीमेंट की सभी बोरियां वास्तव में किसी सरकारी योजना के लिए आवंटित थीं या किसी अन्य स्रोत से आई थीं। इसलिए पूरे मामले में आधिकारिक जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
स्थानीय नागरिकों की मांग है कि संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचकर सीमेंट की बोरियों की जांच करें और यह पता लगाएं कि इन पर अंकित ‘पुनः बिक्री निषेध’ का मतलब क्या है और संबंधित सीमेंट किस योजना या निर्माण कार्य के लिए आवंटित की गई थी।
जांच हुई तो सामने आ सकती है पूरी सप्लाई चेन
मामले की गंभीरता को देखते हुए सिर्फ रिक्शे से सीमेंट ले जाने वाले व्यक्ति तक जांच सीमित रखने के बजाय पूरी सप्लाई चेन की जांच किए जाने की मांग उठ रही है। सीमेंट कहां से आई, किसके नाम पर आई, किसने प्राप्त की, कहां स्टोर हुई, किसे जारी की गई और आखिरकार निजी लोगों तक कैसे पहुंची—इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
यदि रिकॉर्ड और मौके पर उपलब्ध सामग्री में अंतर पाया जाता है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। वहीं यदि जांच में आरोप निराधार पाए जाते हैं तो विभाग की ओर से स्थिति स्पष्ट किए जाने से भी लोगों के बीच चल रही चर्चाओं पर विराम लग सकता है।
अधिकारियों की कार्रवाई का इंतजार
सरकारी सीमेंट की कथित बिक्री का मामला सामने आने के बाद अब निगाहें संबंधित अधिकारियों पर टिकी हैं। स्थानीय नागरिक चाहते हैं कि मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि ‘पुनः बिक्री निषेध’ लिखी सीमेंट की बोरियां यदि वाकई सरकारी आपूर्ति का हिस्सा हैं, तो वे निजी घरों तक कैसे पहुंचीं? इस सवाल का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा। साथ ही यह भी स्पष्ट होगा कि मामला केवल अफवाह और गलतफहमी तक सीमित है या सरकारी सामग्री के कथित दुरुपयोग का कोई बड़ा नेटवर्क इसके पीछे काम कर रहा है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस