ऐतिहासिक महाकाल द्वार अचानक भरभराकर गिरा, बारिश के बीच पास में चल रही थी गहरी खुदाई; 2.12 करोड़ से हुआ था जीर्णोद्धार, आखिर किसकी लापरवाही?

उज्जैन में महाकाल मंदिर से रामघाट को जोड़ने वाला करीब 700 साल पुराना ऐतिहासिक क्षिप्रा द्वार देर रात ढह गया। हादसे में कोई हताहत नहीं हुआ। गहरी खुदाई, सुरक्षात्मक इंतजामों की कमी, बारिश और जमीन धंसने को हादसे की संभावित वजह माना जा रहा है।

ऐतिहासिक महाकाल द्वार अचानक भरभराकर गिरा, बारिश के बीच पास में चल रही थी गहरी खुदाई; 2.12 करोड़ से हुआ था जीर्णोद्धार, आखिर किसकी लापरवाही?

विश्व प्रसिद्ध श्री महाकाल मंदिर से रामघाट जाने वाले प्राचीन मार्ग पर स्थित ऐतिहासिक महाकाल द्वार देर रात अचानक ढह गया

उज्जैन। महाकाल मंदिर से रामघाट जाने वाले प्राचीन मार्ग पर स्थित सदियों पुराना ऐतिहासिक महाकाल द्वार देर रात अचानक भरभराकर गिर गया। घटना के समय द्वार के आसपास कोई व्यक्ति मौजूद नहीं था, जिससे बड़ा हादसा टल गया और जनहानि नहीं हुई। हालांकि, ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रखने वाली इस संरचना के अचानक धराशायी होने से निर्माण गुणवत्ता, सुरक्षा व्यवस्था और आसपास चल रहे निर्माण कार्यों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

घटना की सूचना मिलने के बाद रविवार सुबह उज्जैन स्मार्ट सिटी के अधिकारी मौके पर पहुंचे और घटनास्थल का निरीक्षण किया। प्रारंभिक तौर पर अधिकारियों ने द्वार के आसपास चल रही गहरी खुदाई और पिछले दो-तीन दिनों से लगातार हो रही बारिश को संभावित कारण माना है। अधिकारियों का कहना है कि बारिश के कारण मिट्टी में नमी बढ़ने और जमीन के सेटलमेंट यानी धंसने की वजह से द्वार की संरचना पर दबाव पड़ा हो सकता है। हालांकि, हादसे की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

गहरी खुदाई और लगातार बारिश के बीच गिरा ऐतिहासिक द्वार

कार्यपालन यंत्री कमल सक्सेना के अनुसार, प्रारंभिक जानकारी में सामने आया है कि हादसा रात के समय हुआ। महाकाल द्वार के आसपास डीप एक्सकेवेशन का काम चल रहा था और इसी दौरान लगातार बारिश भी हुई। ऐसी परिस्थितियों में जमीन के धंसने या सेटलमेंट के कारण द्वार की संरचना प्रभावित होने की आशंका है।

अधिकारी ने बताया कि घटना में किसी व्यक्ति के घायल होने या किसी अन्य प्रकार के नुकसान की जानकारी नहीं है। फिलहाल मौके का निरीक्षण कर परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया जा रहा है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसी ऐतिहासिक और पुरानी संरचना के बिल्कुल आसपास गहरी खुदाई का काम चल रहा था, तो उसकी सुरक्षा को लेकर पहले से क्या इंतजाम किए गए थे? क्या खुदाई से पहले संरचना की स्थिरता का तकनीकी परीक्षण किया गया था? क्या बारिश के दौरान निर्माण स्थल की निगरानी बढ़ाई गई थी? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।

2.12 करोड़ रुपए की लागत से चल रहा था जीर्णोद्धार

महाकाल मंदिर से करीब 100 मीटर की दूरी पर स्थित यह द्वार रामघाट जाने वाले पुराने मार्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लंबे समय से जीर्ण-शीर्ण अवस्था में होने के कारण इस रास्ते का इस्तेमाल बंद था। इसके बाद उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड की महाकाल मंदिर परिसर विस्तार परियोजना के तहत करीब 2.12 करोड़ रुपए की लागत से महाकाल द्वार के जीर्णोद्धार का काम शुरू किया गया था।

ऐतिहासिक संरचना को उसकी मूल शैली के अनुरूप संरक्षित करने का दावा किया गया था। निर्माण में आधुनिक सीमेंट के बजाय पारंपरिक चूना तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा था। चंदेरी और ललितपुर से आए कारीगर इस काम में लगाए गए थे।

कारीगरों के मुताबिक निर्माण में चूना, गुड़, मैथी, गूगल, उड़द के पानी, ईंट के चूरे और रेत जैसे पारंपरिक मिश्रण का इस्तेमाल किया जा रहा था। इस तकनीक को ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के लिए लंबे समय से उपयोगी माना जाता रहा है।

ऐसे में जीर्णोद्धार के दौरान ही ऐतिहासिक द्वार का गिर जाना अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या संरचना पहले से कमजोर थी? क्या जीर्णोद्धार के दौरान उसके मूल ढांचे को पर्याप्त मजबूती दी गई? या फिर आसपास की गहरी खुदाई ने जमीन की स्थिरता को प्रभावित किया? इन सभी बिंदुओं की तकनीकी जांच जरूरी है।

सदियों पुराना है महाकाल द्वार

श्री महाकालेश्वर मंदिर के उत्तर में स्थित इस ऐतिहासिक स्थल को महाकाल द्वार के नाम से जाना जाता है। इसे लगभग 14वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ का माना जाता है। इसका निर्माण बेसाल्ट पत्थर और ईंटों से किया गया था।

महाकाल द्वार परिसर में मेहराबदार प्रवेश द्वार, पत्थर की सीढ़ियां, मंदिर से प्राप्त नक्काशीदार पत्थरों के अवशेष और एक पुराना मार्ग मौजूद है। सदियों से यह स्थान महाकाल मंदिर और रामघाट के बीच संपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है।

धार्मिक दृष्टि से भी इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि महाकाल मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं और रामघाट की ओर जाने वाले लोगों के लिए यह ऐतिहासिक मार्ग का हिस्सा रहा है।

कई दौर में हुआ पुनरुद्धार

इतिहास और स्थापत्य से जुड़े विवरणों के अनुसार, मध्ययुग में हुए विनाश के बाद इस स्थल पर अलग-अलग कालखंडों में पुनरुद्धार किए गए। 18वीं शताब्दी में सिंधिया शासन के दौरान भी यहां काम हुआ। आधुनिक दौर में सिंहस्थ कुंभ, वर्ष 2004 के दौरान भी इस क्षेत्र में पुनरुद्धार और विकास कार्य किए गए।

इसके बाद वर्ष 2021 में उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड की योजना के तहत महाकाल द्वार के पुनर्विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ी। उद्देश्य ऐतिहासिक महत्व वाले इस स्थल को संरक्षित करते हुए श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विकसित करना था।

लेकिन अब करोड़ों रुपए की लागत से चल रहे जीर्णोद्धार के दौरान इसका ढांचा गिरने से संरक्षण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

निर्माण गुणवत्ता से लेकर निगरानी तक उठे सवाल

महाकाल द्वार के गिरने के बाद सबसे अहम सवाल निर्माण गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था को लेकर है। यदि द्वार के आसपास गहरी खुदाई चल रही थी, तो क्या खुदाई के प्रभाव का अध्ययन किया गया था? क्या पुरानी संरचना को सहारा देने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए गए थे? लगातार बारिश के दौरान क्या निर्माण स्थल की नियमित निगरानी की गई?

इसके अलावा यह भी जांच का विषय है कि जीर्णोद्धार में इस्तेमाल की जा रही सामग्री और पारंपरिक निर्माण तकनीक निर्धारित मानकों के अनुरूप थी या नहीं।

हालांकि, फिलहाल किसी अधिकारी या निर्माण एजेंसी पर सीधे तौर पर लापरवाही का आरोप साबित नहीं हुआ है। इसलिए इन सवालों का अंतिम जवाब जांच और तकनीकी रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगा।

ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

महाकाल द्वार का गिरना सिर्फ एक निर्माणाधीन ढांचे के क्षतिग्रस्त होने की घटना नहीं है। यह उज्जैन की ऐतिहासिक विरासत और उसे संरक्षित करने की व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है। करोड़ों रुपए खर्च करके जिस धरोहर को बचाने और विकसित करने का प्रयास किया जा रहा था, उसका अचानक गिर जाना प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

अब जरूरत सिर्फ मलबा हटाने या दोबारा निर्माण कराने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि आखिर सदियों पुरानी संरचना किन परिस्थितियों में गिरी। यदि आसपास चल रही खुदाई और बारिश इसका कारण है, तो निर्माण के दौरान आवश्यक सुरक्षा उपाय क्यों प्रभावी नहीं रहे? यदि संरचना की कमजोरी वजह थी, तो जीर्णोद्धार से पहले इसका तकनीकी आकलन कितना प्रभावी था?

इन सवालों की निष्पक्ष और तकनीकी जांच से ही तस्वीर साफ होगी। फिलहाल प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखना और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना है।