आईएएस रिंकू दुग्गा को सुप्रीम कोर्ट से झटका: कुत्ता टहलाने के मामले में नौकरी बहाली पर रोक, केंद्र की याचिका पर नोटिस
दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम को अपना कुत्ता टहलाने के लिए खाली कराने के आरोपों में नौकरी से निकाली गईं आईएएस रिंकू दुग्गा को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। सीजेआई की बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है।
साल 2022 में IAS कपल संजीव खिरवार और उनकी पत्नी IAS रिंकू दुग्गा पर आरोप लगा कि उन्होंने कुत्ते को घुमाने के लिए स्टेडियम में खिलाड़ियों की प्रैक्टिस जल्दी खत्म करवा दी थी. विवाद बढ़ा तो दोनों का दिल्ली से ट्रांसफर कर दिया गया. अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है.
नई दिल्ली। दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में कुत्ता टहलाने के लिए कथित तौर पर स्टेडियम खाली करवाने के मामले से चर्चा में आईं आईएएस अधिकारी रिंकू दुग्गा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नौकरी बहाली पर फिलहाल रोक लगा दी है। केंद्र सरकार ने रिंकू दुग्गा को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने के फैसले को चुनौती देने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं, ने केंद्र सरकार की याचिका पर रिंकू दुग्गा को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने अपने 7 सितंबर के आदेश में स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई होने तक उनकी बहाली पर रोक जारी रहेगी। इस मामले में अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को दी चुनौती
दरअसल, रिंकू दुग्गा को केंद्र सरकार ने अनिवार्य रूप से रिटायर कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी CAT का रुख किया था। CAT ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए बहाली का आदेश दिया था।
इसके बाद केंद्र सरकार ने इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने 15 अप्रैल को CAT के निर्णय को बरकरार रखा। हाई कोर्ट के फैसले के बाद उनकी नौकरी में वापसी का रास्ता साफ हो गया था। हालांकि, अब केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद उनकी बहाली पर अस्थायी रोक लग गई है।
केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी करते हुए आगे की सुनवाई के लिए 13 अक्टूबर की तारीख तय की है।
2022 में सामने आया था त्यागराज स्टेडियम विवाद
रिंकू दुग्गा का नाम साल 2022 में उस समय सुर्खियों में आया था, जब दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम से जुड़ी एक घटना की तस्वीरें और खबरें सामने आई थीं। आरोप लगाया गया था कि रिंकू दुग्गा और उनके पति, जो स्वयं आईएएस अधिकारी हैं, अपने कुत्ते को टहलाने के लिए स्टेडियम को खाली करवाते थे।
बताया गया था कि खिलाड़ियों और एथलीटों को उस समय स्टेडियम से बाहर कर दिया जाता था, ताकि अधिकारी अपने कुत्ते को वहां टहला सकें। घटना से संबंधित तस्वीरें और रिपोर्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया से लेकर प्रशासनिक हलकों तक तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी।
इस मामले ने सरकारी अधिकारियों के विशेषाधिकार और सार्वजनिक सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल खड़े किए थे। हालांकि, बाद की न्यायिक कार्यवाही में इस घटना को रिंकू दुग्गा के खिलाफ की गई कार्रवाई के संदर्भ में अलग-अलग स्तर पर परखा गया।
अनुशासनात्मक कार्रवाई में मिली थी मामूली सजा
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस पूरे मामले के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया था। कोर्ट के सामने यह भी तथ्य रखा गया कि त्यागराज स्टेडियम से जुड़ी घटना के संबंध में रिंकू दुग्गा के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई थी और उन्हें मामूली सजा दी गई थी।
इसके अलावा उनके खिलाफ बिना अनुमति ड्यूटी से गैरहाजिर रहने से जुड़ा आरोप भी विचाराधीन रहा। केंद्र सरकार की ओर से अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फैसले में इन घटनाओं को भी आधार बनाया गया था।
हालांकि, हाई कोर्ट ने माना कि केवल इन घटनाओं के आधार पर किसी अधिकारी को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने के फैसले को उचित ठहराने के लिए अधिकारी के पूरे सर्विस रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने सर्विस रिकॉर्ड को माना था अहम
हाई कोर्ट के फैसले में रिंकू दुग्गा के सर्विस रिकॉर्ड के कई पहलुओं का उल्लेख किया गया था। कोर्ट ने पाया था कि उनकी सालाना परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट यानी APAR में कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी।
इसके अलावा पिछले वर्षों में उनके प्रदर्शन की ग्रेडिंग भी अच्छी रही थी। अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि उनके प्रमोशन पर विचार किया जा रहा था। ऐसे में हाई कोर्ट ने सवाल उठाया कि एक अधिकारी के सर्विस रिकॉर्ड के सकारात्मक पहलुओं को नजरअंदाज करते हुए उसे अनिवार्य रूप से रिटायर करने का फैसला किस आधार पर उचित माना जा सकता है।
हाई कोर्ट ने इसी आधार पर रिव्यू कमिटी के फैसले पर भी सवाल उठाए थे। अदालत के मुताबिक, कमिटी ने अधिकारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड के महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
'डेडवुड' अफसरों को हटाने के सिद्धांत पर चर्चा
अनिवार्य सेवानिवृत्ति के संबंध में हाई कोर्ट ने 'डेडवुड' यानी ऐसे कर्मचारियों या अधिकारियों की अवधारणा पर भी चर्चा की, जिनकी सेवाओं को अब प्रभावी या उपयोगी नहीं माना जाता।
अदालत ने कहा था कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का इस्तेमाल ऐसे अधिकारियों को सेवा से हटाने के लिए किया जाता है, जिन्हें प्रशासन के लिए उपयोगी नहीं माना जा रहा हो। हाई कोर्ट ने रिंकू दुग्गा के मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड को देखते हुए माना था कि उन पर यह सिद्धांत लागू नहीं होता।
अदालत के अनुसार, उनके सर्विस रिकॉर्ड में लगातार खराब प्रदर्शन या ऐसा कोई स्पष्ट आधार सामने नहीं आया, जिससे उन्हें 'डेडवुड' अधिकारी माना जा सके।
अब सुप्रीम कोर्ट में होगी मामले की निर्णायक सुनवाई
हाई कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। सरकार का पक्ष है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति से जुड़े फैसले और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा के दायरे में हाई कोर्ट का हस्तक्षेप उचित था या नहीं, इस पर शीर्ष अदालत विचार करे।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले के गुण-दोष पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। कोर्ट ने सिर्फ केंद्र की चुनौती पर रिंकू दुग्गा को नोटिस जारी किया है और उनकी बहाली पर रोक लगाई है।
इसका मतलब यह है कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को लेकर अंतिम स्थिति अभी तय नहीं हुई है। 13 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दोनों पक्षों को सुन सकता है और आगे की कार्यवाही तय कर सकता है।
मामले ने फिर उठाए प्रशासनिक जवाबदेही के सवाल
रिंकू दुग्गा से जुड़ा मामला केवल एक अधिकारी की नौकरी और अनिवार्य सेवानिवृत्ति तक सीमित नहीं है। त्यागराज स्टेडियम की घटना सामने आने के बाद सरकारी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल और आम नागरिकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं के प्रति जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस हुई थी।
वहीं, न्यायिक प्रक्रिया ने इस मामले का दूसरा पहलू भी सामने रखा है—किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करते समय उसके पूरे सेवा रिकॉर्ड और प्रदर्शन का निष्पक्ष मूल्यांकन कितना जरूरी है।
एक तरफ सार्वजनिक पद पर बैठे अधिकारियों के आचरण को लेकर जवाबदेही का सवाल है, तो दूसरी तरफ यह कानूनी प्रश्न भी है कि क्या कुछ घटनाओं या अनुशासनात्मक मामलों के आधार पर किसी अधिकारी को अनिवार्य रूप से सेवा से हटाया जा सकता है, जबकि उसका समग्र सर्विस रिकॉर्ड अच्छा रहा हो।
अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि रिंकू दुग्गा की बहाली के संबंध में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जाता है या केंद्र सरकार की चुनौती स्वीकार की जाती है। फिलहाल शीर्ष अदालत के अंतरिम आदेश के कारण उनकी बहाली पर रोक बनी रहेगी और अगली सुनवाई तक मामले में स्थिति यथावत रहेगी।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस