जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन पर लगी रोक, 33 साल बाद बदलाव ; अब रामलीला मैदान, बुराड़ी और CBD ग्राउंड में होंगे आंदोलन, निर्भया से किसान-पहलवान आंदोलन तक का गवाह रहा ऐतिहासिक स्थल
गृह मंत्रालय ने जंतर मंतर को लेकर बड़ा फैसला लिया है, अब जंतर मंतर पर किसी भी तरह का आंदोलन और धरना प्रदर्शन नहीं किया जा सकेगा. केंद्र सरकार ने दिल्ली में आंदोलन और धरना प्रदर्शन के लिए तीन जगह नोटिफाई किए हैं. इन तीनों जगहों पर ही आंदोलन किया जा सकेगा.
1724 में जंतर मंतर का निर्मआण जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने करवाया था। उस समय दिल्ली पर मुगल बादशाह मुहम्मद शाह का शासन हुआ करता था। यह एक वेधशाला थी जो कि वास्तुकला, विज्ञान और गणित का एक शानदार नमूना है। इसमें जंतर का अर्थ है यंत्र और मंतर का अर्थ मंत्र है। यानी जंतर-मंतर संस्कृति से लेकर विज्ञान तक जोड़ता है।
संसद के करीब होने से लोकतंत्र की आवाज बना जंतर-मंतर, निर्भया आंदोलन से लेकर किसान-पहलवानों के धरने तक कई ऐतिहासिक प्रदर्शनों का रहा गवाह; CJP के 36 दिन के धरने और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से भी चर्चा में आया
नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन की राजनीति से जुड़े एक ऐतिहासिक स्थल जंतर-मंतर को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है। दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए जंतर-मंतर को निर्धारित धरना-प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का फैसला लिया है। गृह मंत्रालय की ओर से गठित कमेटी की सिफारिश के बाद अब यहां पहले की तरह धरना-प्रदर्शन आयोजित नहीं किए जा सकेंगे। प्रदर्शनकारियों के लिए वैकल्पिक स्थानों के रूप में रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी (CBD) ग्राउंड को चुना गया है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब जंतर-मंतर लंबे समय से देश के राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा है। संसद और कई महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों के नजदीक स्थित होने के कारण यह जगह उन लोगों के लिए खास रही है, जो अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाना चाहते थे। पिछले कई दशकों में यहां हुए आंदोलनों ने राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक बहस और जनहित के मुद्दों को प्रभावित किया है। गृह मंत्रालय की कमेटी की सिफारिश पर फैसला
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से संबंधित व्यवस्था में बदलाव के लिए गृह मंत्रालय ने एक कमेटी गठित की थी। इसका उद्देश्य नागरिक अधिकारों और अन्य मांगों को लेकर आंदोलन करने वाले लोगों के लिए उपयुक्त स्थान निर्धारित करना था। कमेटी की सिफारिश के बाद जंतर-मंतर को निर्धारित प्रोटेस्ट साइट की सूची से हटाने का निर्णय लिया गया।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, अब प्रदर्शन और धरना आयोजित करने के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली स्थित सीबीडी ग्राउंड का विकल्प उपलब्ध रहेगा। इन स्थानों पर प्रदर्शन आयोजित करने के लिए पुलिस विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) भी जारी करेगी।
यह बदलाव 28 अप्रैल 2022 को जारी आदेश में आंशिक संशोधन के रूप में किया गया है। प्रशासन का तर्क है कि राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक स्थलों की व्यवस्था जरूरी है।
हालांकि, इस फैसले के बाद जंतर-मंतर की ऐतिहासिक भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सवाल यह है कि जिस जगह ने दशकों तक आम नागरिकों, किसानों, युवाओं, कर्मचारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने का मंच दिया, वहां प्रदर्शन पर रोक का असर देश के आंदोलनकारी समूहों पर किस तरह पड़ेगा।
1993 के बाद आंदोलनों का प्रमुख केंद्र बना जंतर-मंतर
जंतर-मंतर का इतिहास केवल खगोलीय वेधशाला तक सीमित नहीं है। समय के साथ यह लोकतांत्रिक विरोध और जनआंदोलनों का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। वर्ष 1993 के बाद यहां धरना-प्रदर्शन की गतिविधियां बढ़ने लगीं। संसद के नजदीक होने और मीडिया की पहुंच आसान होने के कारण यह स्थान आंदोलनकारियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना।
यहां आने वाले प्रदर्शनकारियों का उद्देश्य अपनी मांगों को सरकार और देश के सामने रखना रहा है। किसी आंदोलन में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा, तो किसी में सामाजिक न्याय, किसानों की समस्याओं, सैनिकों की पेंशन, महिला सुरक्षा और राजनीतिक जवाबदेही की मांग की गई।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वालों को उम्मीद रहती थी कि संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के करीब होने के कारण उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी। यही वजह है कि छोटे समूहों से लेकर देशव्यापी आंदोलनों तक के लिए यह जगह खास बनी रही।
निर्भया आंदोलन से किसान आंदोलन तक, कई बड़े प्रदर्शन
जंतर-मंतर ने बीते वर्षों में कई महत्वपूर्ण आंदोलनों को अपने परिसर में जगह दी। इन प्रदर्शनों में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों से जुड़े आंदोलन शामिल रहे हैं।
निर्भया आंदोलन: दिसंबर 2012 में दिल्ली में सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद महिला सुरक्षा और सख्त कानूनों की मांग को लेकर देशभर में आक्रोश फैल गया था। इस दौरान दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शनों ने महिला सुरक्षा और आपराधिक कानूनों पर राष्ट्रीय बहस को तेज किया। जंतर-मंतर भी इस विरोध की प्रमुख जगहों में शामिल रहा।
वन रैंक, वन पेंशन आंदोलन: पूर्व सैनिकों ने वन रैंक, वन पेंशन (OROP) योजना को लेकर अपनी मांगें उठाईं। पेंशन में समानता और पूर्व सैनिकों के अधिकारों से जुड़े इस आंदोलन ने लंबे समय तक राजनीतिक चर्चा में जगह बनाए रखी।
तमिलनाडु के किसानों का प्रदर्शन: वर्ष 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने कृषि संकट, कर्ज और राहत की मांगों को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन किया। किसानों ने अपनी समस्याओं की ओर केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए अनोखे तरीकों से विरोध जताया।
नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन: नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध हुआ। दिल्ली में भी इस मुद्दे पर प्रदर्शन आयोजित किए गए और जंतर-मंतर ऐसे विरोधों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले प्रमुख स्थलों में रहा।
किसान आंदोलन और किसान संसद: वर्ष 2021 में कृषि कानूनों के खिलाफ चले किसान आंदोलन के दौरान जंतर-मंतर पर किसान संसद का आयोजन किया गया। किसानों ने यहां अपनी मांगों और कृषि कानूनों से जुड़ी चिंताओं को सामने रखा।
पहलवानों का धरना: वर्ष 2023 में भारतीय कुश्ती संघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया। पहलवानों का धरना लंबे समय तक चर्चा में रहा और इसने खेल प्रशासन, महिला सुरक्षा तथा खिलाड़ियों के अधिकारों को लेकर राष्ट्रीय बहस छेड़ी। बृजभूषण शरण सिंह ने आरोपों से इनकार किया था।
इन आंदोलनों ने जंतर-मंतर को महज एक सार्वजनिक स्थल के बजाय लोकतांत्रिक असहमति के प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन से भी जुड़ा इतिहास
वर्ष 2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल आंदोलन ने देशभर में व्यापक जनसमर्थन हासिल किया था। इस आंदोलन की शुरुआती गतिविधियों और विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर का भी इस्तेमाल हुआ।
आंदोलन को जब व्यापक समर्थन मिलने लगा और बड़ी संख्या में लोग जुटने लगे, तब प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान प्रमुख स्थल बन गया। लोकपाल आंदोलन ने भ्रष्टाचार, सरकारी जवाबदेही और राजनीतिक व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया।
इस दौर ने यह भी दिखाया कि जंतर-मंतर जैसे सीमित आकार वाले स्थल पर शुरू हुआ आंदोलन किस तरह बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
CJP का 36 दिन का धरना और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग
हाल के समय में जंतर-मंतर एक अन्य विवाद और राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर चर्चा में रहा। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने यहां अपना पहला आंदोलन किया था। पार्टी के आंदोलन से जुड़े विवरणों के मुताबिक, एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को लेकर उठाए गए मुद्दों पर तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई थी।
CJP ने यहां 36 दिनों तक धरना दिया था। इस प्रदर्शन ने जंतर-मंतर को लेकर चल रही राजनीतिक बहस में एक नया अध्याय जोड़ा। हालांकि, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को इस आंदोलन का प्रत्यक्ष परिणाम मानने के लिए स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सरकार के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अब पूरा देश ही जंतर-मंतर बनेगा।
दिपके के शब्दों में, "उन्होंने जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की तय जगह के तौर पर हटा दिया है। हां, अब यह विरोध-प्रदर्शन की जगह नहीं रही, क्योंकि इसे युद्ध का मैदान बना दिया गया था। अब पूरा देश जंतर-मंतर बनेगा!"
उनकी प्रतिक्रिया का आशय यह था कि किसी एक निर्धारित स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति समाप्त होने से विरोध की भावना खत्म नहीं होगी। उनके बयान ने यह सवाल भी उठाया कि क्या किसी आंदोलन की ताकत केवल उसके स्थान से तय होती है या उसकी आवाज दूसरे माध्यमों से भी लोगों तक पहुंच सकती है।
आखिर क्यों प्रदर्शनकारियों की पहली पसंद रहा जंतर-मंतर?
जंतर-मंतर की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह इसकी भौगोलिक स्थिति रही है। यह दिल्ली के उस इलाके में स्थित है, जहां से संसद भवन, केंद्रीय मंत्रालयों और कई महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों तक पहुंच आसान है।
संसद भवन यहां से लगभग एक से दो किलोमीटर की दूरी पर है। इसके आसपास नीति आयोग और आकाशवाणी भवन जैसे संस्थान स्थित हैं। नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक भी इसी व्यापक सरकारी क्षेत्र में आते हैं, जहां गृह, वित्त और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों के कार्यालय रहे हैं।
इसके अलावा ट्रांसपोर्ट भवन, कृषि भवन, उद्योग भवन, निर्माण भवन, शास्त्री भवन और राष्ट्रीय अभिलेखागार जैसे संस्थान भी आसपास के इलाके में स्थित हैं। राष्ट्रपति भवन भी यहां से अधिक दूर नहीं है।
जंतर-मंतर संसद मार्ग, जनपथ, अशोक रोड और टॉल्स्टॉय मार्ग जैसे महत्वपूर्ण मार्गों से जुड़ा हुआ है। कनॉट प्लेस और राजीव चौक के नजदीक होने के कारण यहां पहुंचना अपेक्षाकृत आसान रहा है। पटेल चौक मेट्रो स्टेशन भी इस इलाके को सार्वजनिक परिवहन से जोड़ता है।
यही कारण है कि जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों को मीडिया का ध्यान मिलने और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आने की संभावना रहती थी। आंदोलनकारी यहां अपनी मांगों को केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित रखने के बजाय केंद्र सरकार और देश के नागरिकों तक पहुंचाने की कोशिश करते थे।
मुगल काल में नहीं, 18वीं सदी में बनी थी वेधशाला
जंतर-मंतर के ऐतिहासिक महत्व को समझने के लिए इसके मूल इतिहास को जानना भी जरूरी है। दिल्ली का जंतर-मंतर 18वीं सदी में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। इसका निर्माण खगोलीय गणनाओं और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का अध्ययन करने के उद्देश्य से किया गया था।
इसलिए इसे मुगल काल में बनी वेधशाला कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा। इसका निर्माण मुगल शासन के दौर में, सवाई जय सिंह द्वितीय के समय हुआ था। यहां मौजूद विशाल खगोलीय यंत्र उस समय के वैज्ञानिक ज्ञान और स्थापत्य कौशल का उदाहरण हैं।
बाद के वर्षों में दिल्ली का जंतर-मंतर अपनी मूल वैज्ञानिक पहचान से आगे बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक विरोध का प्रतीक बन गया। इस तरह एक ऐतिहासिक वेधशाला लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए पहचानी जाने वाली जगह बन गई।
क्या जंतर-मंतर की आवाज अब खामोश हो जाएगी?
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का फैसला दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की व्यवस्था को बदलने वाला कदम है। अब आंदोलनकारियों को रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड जैसे वैकल्पिक स्थानों का इस्तेमाल करना होगा। इन जगहों पर प्रदर्शन के लिए जारी होने वाली SOP के तहत अनुमति और अन्य शर्तों का पालन करना पड़ेगा।
हालांकि, किसी स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति समाप्त होने और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार के बीच अंतर है। जंतर-मंतर पर प्रतिबंध का मतलब अपने आप यह नहीं है कि देश में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार समाप्त हो गया है। प्रदर्शनकारियों को लागू कानूनों और प्रशासनिक नियमों के अधीन निर्धारित स्थानों पर अपनी मांगें उठाने का अवसर मिलेगा।
फिर भी, जंतर-मंतर का प्रतीकात्मक महत्व आसानी से खत्म नहीं होगा। निर्भया आंदोलन, किसान संसद, पूर्व सैनिकों की मांगें, पहलवानों का धरना और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों से जुड़ी इसकी पहचान भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का हिस्सा बनी रहेगी।
जिस जगह पर दशकों तक नारे गूंजते रहे और विभिन्न वर्गों ने अपनी समस्याओं को सत्ता तक पहुंचाने की कोशिश की, वहां अब प्रदर्शन नहीं हो सकेंगे। लेकिन CJP संस्थापक अभिजीत दिपके के बयान की तरह यह बहस आगे भी जारी रह सकती है कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज को किसी एक जगह तक सीमित किया जा सकता है या नहीं।
जंतर-मंतर का इतिहास बताता है कि आंदोलन किसी मैदान से शुरू हो सकते हैं, लेकिन उनका प्रभाव समाज और राजनीति तक फैलता है। अब देखना होगा कि नए निर्धारित स्थलों पर होने वाले प्रदर्शन जंतर-मंतर की इस ऐतिहासिक भूमिका को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस