78 हजार सागौन के पौधे काटने और 31.48 हेक्टेयर जमीन पर कब्जे का दावा, जांच रिपोर्ट CM को सौंपी; प्रभावित परिवारों के साथ धरने में पहुंचे थे शिवराज-कार्तिकेय
सीहोर जिले के बुदनी में वन भूमि पर अतिक्रमण हटाने के दौरान आदिवासियों के मकान तोड़ने के मामले में सनसनीखेज खुलासा हुआ है। सीहोर कलेक्टर की जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि सीहोर जिले में दूसरे जिलों से आने वाले लोगों ने अवैध रूप से वन भूमि पर कब्जा कर रहे हैं। हजारों सागौन के पौधों को काटकर जमीन कब्जाने झोपड़ियां बना ली हैं।
सीहोर में आदिवासियों के मकान तोड़े जाने पर जांच रिपोर्ट शासन को सौंपी: रिपोर्ट में दावा—दूसरे जिलों से आए लोगों ने सागौन के पौधे काटकर वन भूमि पर बनाई झोपड़ियां, 31.48 हेक्टेयर जमीन से हटाया अतिक्रमण; शिवराज-कठिकेय के धरने के बाद सीएम ने दिए थे जांच के आदेश
भोपाल। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के बुधनी वन क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने के दौरान आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने के मामले में जांच रिपोर्ट शासन को सौंप दी गई है। रिपोर्ट मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल को भेजी गई है। रिपोर्ट में वन विभाग की कार्रवाई को लेकर कई तथ्य सामने रखे गए हैं। वहीं प्रभावित परिवारों और बारेला समाज की ओर से सरकारी रिपोर्ट को गलत बताते हुए दावा किया गया है कि वे वर्षों से वहां रह रहे हैं और उनके पास जमीन से जुड़े दस्तावेज व अन्य प्रमाण मौजूद हैं।
मामले ने उस समय राजनीतिक तूल पकड़ लिया था, जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके बेटे कार्तिकेय सिंह प्रभावित परिवारों के धरने में शामिल हुए। वन विकास निगम के डिपो के बाहर मंगलवार को तीसरे दिन भी प्रभावित लोगों का धरना-प्रदर्शन जारी रहा।
जांच रिपोर्ट में क्या आया सामने?
जांच रिपोर्ट के अनुसार भैरूंदा तहसील के लाड़कुई परिक्षेत्र की कोसमी बीट स्थित रिजर्व फॉरेस्ट के कंपार्टमेंट नंबर 426 में वन विकास निगम की जमीन पर अतिक्रमण किया गया था। कार्रवाई के दौरान कुल 31.48 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
रिपोर्ट में बताया गया कि वर्ष 2020 में सामान्य वनमंडल की 186.960 हेक्टेयर वन भूमि वन विकास निगम के सीहोर परियोजना मंडल को हस्तांतरित की गई थी। इसके बाद वर्ष 2021 में निगम ने करीब 135 हेक्टेयर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सागौन का पौधारोपण कराया।
वन विभाग के अनुसार इस क्षेत्र में 3 लाख 37 हजार 500 सागौन के पौधे लगाए गए थे। जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इनमें से 78 हजार 700 पौधे काट दिए गए और करीब 31.48 हेक्टेयर क्षेत्र में कब्जा कर खेती और झोपड़ियां बनाने का काम किया गया।
2021 तक खाली था पूरा क्षेत्र, 2022 में झोपड़ियां बनने का दावा
रिपोर्ट में गूगल अर्थ की टाइमलाइन तस्वीरों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार वर्ष 2021 तक कंपार्टमेंट 426 का पूरा क्षेत्र खाली दिखाई देता था। रिपोर्ट में दावा है कि वर्ष 2022 में सुनील, पिता शैतान, सहित अन्य 11 लोगों ने यहां लगाए गए पौधों को नष्ट कर अस्थायी झोपड़ियां बना लीं।
इसके बाद खेती के लिए करीब 31.48 हेक्टेयर वन भूमि पर कब्जा किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है। वन विभाग की ओर से इसी अतिक्रमण को हटाने के लिए कार्रवाई की गई थी।
नौ झोपड़ियां हटाने और कुआं भरने का दावा
कलेक्टर की जांच रिपोर्ट के मुताबिक 11 अक्टूबर को कार्रवाई के दौरान कुल नौ झोपड़ियां हटाई गईं। इसके अलावा मौके पर मौजूद एक अवैध कुएं को मिट्टी और मुरम से भरने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पूरी कार्रवाई की ड्रोन वीडियोग्राफी कराई गई। प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई के दौरान वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया और मौके की स्थिति को रिकॉर्ड किया गया।
आदिवासी परिवारों के दावे पर रिपोर्ट में उठाए गए सवाल
जांच रिपोर्ट में उन परिवारों के भूमिहीन होने के दावे पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कार्रवाई के दौरान हटाए गए सभी नौ कब्जाधारियों के सिंहपुर और हबीबनगर में पहले से पक्के मकान मौजूद हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन परिवारों के नाम से मकान नंबर और वोटर आईडी कार्ड भी दर्ज हैं। भैरूंदा के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि भूमिहीन होने का दावा करने वाले लोगों के मूल गांवों में भी पक्के मकान मौजूद हैं।
प्रशासन का तर्क है कि इससे यह सवाल उठता है कि वन क्षेत्र में बनाए गए अस्थायी आवासों को स्थायी निवास के रूप में किस आधार पर माना जा रहा था।
शिवराज और कार्तिकेय के धरने में शामिल होने से बढ़ा विवाद
मामला तब और ज्यादा चर्चा में आया, जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रभावित परिवारों के धरने में पहुंचे। उनके बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान भी धरने में शामिल हुए।
शिवराज सिंह चौहान ने कार्रवाई को लेकर अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को फोन पर पूरे मामले की जानकारी दी थी। इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मामले की जांच के निर्देश दिए थे।
जांच के बाद अब प्रशासन की रिपोर्ट शासन को भेजी गई है। रिपोर्ट में वन विभाग की कार्रवाई के समर्थन में पौधारोपण, भूमि हस्तांतरण, गूगल अर्थ की तस्वीरों और मौके पर हुई कार्रवाई का उल्लेख किया गया है।
तीसरे दिन भी जारी रहा आदिवासी परिवारों का धरना
जांच रिपोर्ट सामने आने के बावजूद प्रभावित परिवारों का विरोध खत्म नहीं हुआ है। वन विकास निगम के डिपो के बाहर मंगलवार को तीसरे दिन भी धरना-प्रदर्शन जारी रहा।
प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि वे वर्षों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं और उन्हें अचानक अतिक्रमणकारी बताकर उनके घरों को हटाया गया है। उनका आरोप है कि प्रशासन ने उनके पक्ष को पर्याप्त रूप से नहीं सुना।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनके पास ऐसे दस्तावेज और प्रमाण हैं, जिनसे उनके लंबे समय से वहां रहने की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
बारेला समाज ने रिपोर्ट को बताया गलत
बारेला समाज के अध्यक्ष रमेश बारेला ने सरकारी जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की रिपोर्ट पूरी तरह गलत है। उनके मुताबिक प्रभावित परिवार वर्षों से इसी क्षेत्र में रह रहे हैं और उनके पास अपने दावे को साबित करने के लिए दस्तावेज और अन्य प्रमाण मौजूद हैं।
रमेश बारेला ने आरोप लगाया कि गरीब आदिवासी परिवारों को परेशान किया जा रहा है और उन्हें जबरन जमीन से बेदखल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि समाज की ओर से भी जांच के दौरान अपने सभी प्रमाण उपलब्ध कराए जाएंगे।
सरकारी रिपोर्ट और आदिवासी परिवारों के दावों में विरोधाभास
पूरे मामले में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल सरकारी जांच रिपोर्ट और प्रभावित परिवारों के दावों के बीच दिखाई देने वाला विरोधाभास है। प्रशासन जहां इसे वन भूमि पर किया गया अतिक्रमण बता रहा है, वहीं प्रभावित परिवार इसे वर्षों से चले आ रहे निवास और अपने अधिकार से जोड़कर देख रहे हैं।
सरकारी रिपोर्ट में सागौन के पौधे काटे जाने, वन भूमि पर झोपड़ियां बनाए जाने और संबंधित लोगों के दूसरे स्थानों पर पक्के मकान होने जैसे बिंदुओं को कार्रवाई के आधार के रूप में रखा गया है। दूसरी ओर आदिवासी परिवारों का कहना है कि उनके पास अपने पक्ष में दस्तावेज मौजूद हैं और वे इन्हें सरकार के सामने रखेंगे।
अब दस्तावेजों और दावों की होगी अहम भूमिका
जांच रिपोर्ट शासन को भेजे जाने के बाद अब मामले में प्रभावित परिवारों की ओर से पेश किए जाने वाले दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यदि परिवार अपने लंबे समय से निवास, भूमि पर अधिकार या अन्य वैधानिक दावों से संबंधित प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, तो उन दस्तावेजों की जांच के आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल प्रशासन ने अपनी जांच रिपोर्ट में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को उचित ठहराने वाले तथ्य रखे हैं, जबकि प्रभावित परिवार और बारेला समाज इस रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं। ऐसे में सीहोर के बुधनी वन क्षेत्र में आदिवासियों के मकान तोड़े जाने का विवाद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और दोनों पक्षों के दावों के बीच आगे की कार्रवाई पर नजर बनी हुई है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस