कोर्ट जाते वक्त 'प्लास्टर ड्रामा', जेल पहुंचते ही आरोपियों ने उतारकर फेंके प्लास्टर; VIDEO से पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
दहशत फैलाने वाले गुंडों के हाथ-पैर पर चढ़ने वाले प्लास्टर के मामले में पुलिस का फर्जीवाड़ा सामने आया है। हीरानगर क्षेत्र में कार चालक के साथ मारपीट और दुकान में तोड़फोड़ के दो आरोपी निक्की अहिरवार और ओम जगताप को पुलिस ने कोर्ट और मीडिया के सामने पेश किया तो उनके हाथ पर प्लास्टर बंधा था। जब वे जिला जेल पहुंचे तो पुलिसकर्मी के साथ खड़े होकर ही पट्टा निकालकर फेंक दिया।
इंदौर के हीरानगर थाना क्षेत्र में गिरफ्तार आरोपियों का हाथ-पैर में पट्टियां और प्लास्टर बांधकर पुलिस ने जुलूस निकाला. लेकिन जिला जेल पहुंचते ही आरोपियों ने खुद पट्टियां खोलकर फेंक दीं.
इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस की कार्यप्रणाली और आरोपियों के साथ बरते जाने वाले तरीके पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। गुंडागर्दी और मारपीट के मामले में गिरफ्तार दो आरोपियों को जब पुलिस मीडिया के सामने लेकर पहुंची तो उनके हाथ और पैरों में प्लास्टर बंधे हुए थे। पुलिस ने दावा किया कि गिरफ्तारी के दौरान दोनों आरोपी भागने की कोशिश में घायल हो गए थे, इसलिए उनके हाथ-पैर में प्लास्टर चढ़ाया गया है। लेकिन कुछ ही घंटों बाद जिला जेल के बाहर सामने आए एक वीडियो ने पूरे घटनाक्रम को विवादों में ला दिया।
वीडियो में दोनों आरोपी जेल परिसर के बाहर पुलिस की मौजूदगी में अपने हाथ और पैरों से प्लास्टर उतारते हुए दिखाई देते हैं। इतना ही नहीं, प्लास्टर उतारने के बाद उन्हें वहीं फेंक दिया जाता है। पुलिसकर्मी मौके पर मौजूद रहते हैं, लेकिन वीडियो में किसी तरह की रोक-टोक या आपत्ति दर्ज होती नजर नहीं आती। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई और पुलिस के दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, इंदौर के हीरानगर थाना क्षेत्र में कुछ दिनों पहले एक कार चालक के साथ मारपीट और एक दुकान में तोड़फोड़ की घटना हुई थी। इस मामले में पुलिस ने निक्की अहिरवार और ओम जगताप नामक दो आरोपियों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस ने दोनों को मीडिया के सामने पेश किया, तब उनके हाथों और पैरों में प्लास्टर बंधा हुआ था।
पुलिस अधिकारियों ने उस समय बताया कि दोनों आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए भागने लगे थे। पीछा करने के दौरान वे गिरकर घायल हो गए, जिसके बाद उनका इलाज कराया गया और हाथ-पैर में प्लास्टर लगाया गया। पुलिस का दावा था कि चोटें भागने की कोशिश के दौरान लगी थीं और उनका चिकित्सकीय उपचार कराया गया है।
जेल पहुंचते ही बदल गया पूरा घटनाक्रम
मीडिया ब्रीफिंग के बाद पुलिस दोनों आरोपियों को न्यायिक प्रक्रिया के तहत इंदौर जिला जेल लेकर पहुंची। इसी दौरान जेल के बाहर मौजूद कुछ लोगों ने ऐसा दृश्य देखा, जिसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया।
वीडियो में दोनों आरोपी अपने हाथों और पैरों में लगे प्लास्टर को आराम से निकालते हुए दिखाई देते हैं। प्लास्टर उतारने के दौरान पुलिसकर्मी भी वहीं मौजूद रहते हैं, लेकिन वीडियो में किसी तरह की आपत्ति या हस्तक्षेप नजर नहीं आता। प्लास्टर हटाने के बाद दोनों आरोपी उन्हें वहीं फेंक देते हैं। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और देखते ही देखते चर्चा का विषय बन गया।
पुलिस के दावे पर उठे सवाल
वीडियो सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि आरोपियों के हाथ-पैर वास्तव में फ्रैक्चर या गंभीर रूप से घायल थे, तो वे इतनी आसानी से प्लास्टर कैसे उतार सके? यदि प्लास्टर केवल सामान्य पट्टी या अस्थायी चिकित्सा का हिस्सा था, तो फिर मीडिया के सामने इसे किस रूप में प्रस्तुत किया गया?
इन सवालों ने पुलिस की पूरी कार्रवाई को संदेह के घेरे में ला दिया है। लोगों का कहना है कि यदि पुलिस द्वारा दी गई जानकारी और वास्तविक स्थिति में अंतर है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
एसीपी ने दिए जांच के निर्देश
मामले के सामने आने के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों से जवाब मांगा गया। एसीपी रुबीना मेजबानी ने कहा कि मामला उनके संज्ञान में आया है और इसकी जांच कराई जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही, नियमों का उल्लंघन या गलत जानकारी देने की पुष्टि होती है, तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस
वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि वीडियो के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरे मामले की आधिकारिक जांच का इंतजार किया जाना चाहिए।
कई लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि आरोपी वास्तव में घायल थे, तो उन्हें बिना चिकित्सकीय निगरानी के प्लास्टर हटाने की अनुमति कैसे दी गई। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि यदि प्लास्टर केवल अस्थायी सहारे के लिए लगाया गया था, तो इसकी स्पष्ट जानकारी पहले ही सार्वजनिक की जानी चाहिए थी।
पुलिस कार्रवाई पर फिर उठी पारदर्शिता की मांग
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब पुलिस की कार्यप्रणाली और गिरफ्तारी के दौरान अपनाए जाने वाले तरीकों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। आमतौर पर पुलिस का कहना होता है कि आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए भागते हैं और इसी दौरान घायल हो जाते हैं। दूसरी ओर, कई मामलों में पुलिस पर आरोपियों के साथ मारपीट के आरोप भी लगते रहे हैं। ऐसे में इंदौर का यह मामला एक बार फिर पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस का कारण बन गया है।
फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आरोपियों के हाथ-पैर में लगाया गया प्लास्टर वास्तविक चिकित्सकीय आवश्यकता थी या फिर घटनाक्रम में कोई और पहलू भी शामिल है। तब तक वायरल वीडियो और पुलिस के शुरुआती दावों के बीच का विरोधाभास चर्चा का विषय बना हुआ है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस