सोनम वांगचुक का सनसनीखेज दावा, बोले - सफदरजंग हॉस्पिटल में कैदी की तरह ट्रीट किया
NEET पेपर लीक आंदोलन के दौरान 26 दिन का अनशन समाप्त करने के बाद सोनम वांगचुक ने आरोप लगाया कि सफदरजंग अस्पताल में उनके साथ कैदी जैसा व्यवहार किया गया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें कमरे से बाहर निकलने, परिजनों और समर्थकों से मिलने तथा मोबाइल-लैपटॉप रखने की अनुमति नहीं थी। वांगचुक ने अस्पताल का माहौल "उत्तर कोरिया जैसा" बताते हुए इसे गैरकानूनी बताया
सोनम वांगचुक के आरोपों से उठा नया विवाद: अस्पताल में 'कैदी जैसा व्यवहार' का दावा, पुलिस नियंत्रण पर गीतांजलि ने उठाए सवाल
नई दिल्ली। NEET पेपर लीक मामले को लेकर देशभर में जारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधार के पक्षधर सोनम वांगचुक के आरोपों ने एक नया राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा कर दिया है। 26 दिनों तक जंतर-मंतर पर छात्रों और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के समर्थन में अनशन करने के बाद शुक्रवार को उन्होंने अपना उपवास समाप्त किया, लेकिन इसके साथ ही दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में अपने साथ हुए व्यवहार को लेकर गंभीर आरोप लगाए।
वांगचुक ने दावा किया कि अस्पताल में उनके साथ किसी मरीज की तरह नहीं बल्कि एक कैदी की तरह व्यवहार किया गया। उन्होंने कहा कि अस्पताल का माहौल उन्हें लोकतांत्रिक देश से अधिक उत्तर कोरिया जैसे तंत्र की याद दिला रहा था। उनके इन आरोपों के बाद अस्पतालों में पुलिस की भूमिका और हिरासत में न होने के बावजूद किसी व्यक्ति पर लगाए जाने वाले नियंत्रण को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
26 दिन बाद खत्म किया अनशन
सोनम वांगचुक पिछले 26 दिनों से जंतर-मंतर पर NEET-UG पेपर लीक मामले की निष्पक्ष जांच और छात्रों की मांगों के समर्थन में अनशन पर बैठे थे। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से हटाकर सफदरजंग अस्पताल ले गई थी। उस समय पुलिस ने कहा था कि उनकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए और अदालत के निर्देशों के अनुरूप उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
अनशन समाप्त करने के बाद वांगचुक ने करीब 24 मिनट का वीडियो जारी किया, जिसमें उन्होंने अस्पताल में बिताए गए दिनों के अनुभव साझा किए।
'अस्पताल नहीं, जेल जैसा माहौल था'
वीडियो में वांगचुक ने आरोप लगाया कि अस्पताल में उन्हें पूरी तरह अलग-थलग रखा गया। उनके अनुसार उन्हें कमरे से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी और अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी थी कि कोई भी उनसे मिलने नहीं आ सकता था।
उन्होंने कहा कि उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया जैसा किसी कैदी के साथ भी शायद ही किया जाता हो। उनका दावा है कि उन्हें अपने परिजनों, मित्रों और समर्थकों से मिलने नहीं दिया गया।
मोबाइल और लैपटॉप रखने की भी अनुमति नहीं
वांगचुक ने यह भी आरोप लगाया कि अस्पताल प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों ने उनका मोबाइल फोन और लैपटॉप भी अपने पास रखने की अनुमति नहीं दी। इससे उनका बाहरी दुनिया से संपर्क पूरी तरह टूट गया।
उन्होंने कहा कि किसी तक संदेश पहुंचाने का एकमात्र तरीका कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लिखकर किसी तरह बाहर भेजना था, जो बेहद कठिन था।
लंदन से आए रिश्तेदारों को भी नहीं मिलने दिया
सोनम वांगचुक ने दावा किया कि लंदन से उनसे मिलने आए उनके रिश्तेदारों और दोस्तों को भी अस्पताल में प्रवेश नहीं करने दिया गया। उनके अनुसार यह पूरी प्रक्रिया गैरकानूनी थी और इससे उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे वे किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं बल्कि एक दमनकारी शासन के अधीन हों।
उन्होंने कहा कि यह अनुभव उनके लिए बेहद पीड़ादायक था और इससे नागरिक अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद रोके रखने का आरोप
वांगचुक ने यह भी आरोप लगाया कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा उन्हें निजी अस्पताल में स्थानांतरित होने की अनुमति दिए जाने के बावजूद उन्हें तत्काल अस्पताल से जाने नहीं दिया गया।
उनके अनुसार अधिकारियों ने यह कहकर उन्हें रोके रखा कि अदालत का लिखित आदेश अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। उनका आरोप है कि आदेश दोपहर में जारी होने के बावजूद उसे शाम तक लागू नहीं किया गया, जिससे उनकी रिहाई में अनावश्यक देरी हुई।
गीतांजलि ने पुलिस नियंत्रण पर उठाए सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बीच गीतांजलि ने अस्पतालों में पुलिस की भारी मौजूदगी और मरीजों पर नियंत्रण को लेकर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने पूछा कि यदि कोई व्यक्ति औपचारिक रूप से पुलिस हिरासत में नहीं है, तो उस पर इस प्रकार का नियंत्रण किस कानूनी आधार पर किया जा सकता है। उनका कहना है कि अस्पताल उपचार का स्थान होता है, न कि किसी व्यक्ति को अलग-थलग रखने का केंद्र।
गीतांजलि ने यह भी आपत्ति जताई कि यदि किसी मरीज से मिलने पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए और उसके संचार के साधन भी छीन लिए जाएं, तो यह नागरिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।
पुलिस का पक्ष
दिल्ली पुलिस का पहले से यही कहना रहा है कि सोनम वांगचुक को उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सकीय सलाह के आधार पर अस्पताल ले जाया गया था। पुलिस का कहना था कि यह कदम उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उठाया गया।
हालांकि वांगचुक द्वारा लगाए गए नए आरोपों पर पुलिस की विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है।
देशभर में जारी है विरोध
उधर, NEET पेपर लीक मामले को लेकर विरोध-प्रदर्शन लगातार जारी हैं। बिहार में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं, जबकि दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी छात्रों और पुलिस के बीच तनाव देखने को मिला। हालात बिगड़ने पर रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।
छात्र संगठनों का कहना है कि वे परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार का कहना है कि मामले की जांच और आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।
कानूनी और संवैधानिक बहस
सोनम वांगचुक के आरोपों और गीतांजलि द्वारा उठाए गए सवालों ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में नहीं है, तो उसके आवागमन, मुलाकात और संचार पर लगाए गए प्रतिबंधों का कानूनी आधार स्पष्ट होना चाहिए।
अब इस मामले में पुलिस, अस्पताल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की प्रतिक्रिया के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है। फिलहाल यह विवाद NEET आंदोलन से आगे बढ़कर नागरिक अधिकारों, पुलिस की भूमिका और अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस