50 लाख मुफ्त रजिस्ट्रियों पर संकट! स्वामित्व योजना में पटवारियों ने साइन से किया इनकार, तहसीलदार भी विरोध में
गांवों की आबादी भूमि पर काबिज लोगों को मालिकाना हक देने के लिए शुरू की गई स्वामित्व योजना अब पटवारियों के विरोध में उलझ गई है। पिछले 20 दिन से पटवारी इस योजना की रजिस्ट्री कराने से इनकार कर रहे हैं।
संघों के अनुसार स्वामित्व प्रक्रिया में पंजीयन और दस्तावेज का निष्पादन दो अलग कानूनी कार्य हैं। पंजीयन के लिए तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक या प्रभारी राजस्व निरीक्षक को Sub-Registrar की भूमिका दिए जाने का उल्लेख है, लेकिन पटवारी को एक्जीक्यूटेंट बनाने का अलग वैधानिक आधार स्पष्ट नहीं है। राजस्व अमले का कहना है कि ड्रोन सर्वे, ग्राउंड ट्रूथिंग, सीमांकन, पहचान और रिकॉर्ड सत्यापन जैसे काम पटवारी पहले की तरह करते रहेंगे। आपत्ति केवल अंतिम संपत्ति दस्तावेज पर हस्ताक्षर और उससे जुड़ी कानूनी जवाबदेही को लेकर है।
भोपाल। मध्यप्रदेश में ग्रामीण आबादी को संपत्ति का कानूनी दस्तावेज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लागू की जा रही स्वामित्व योजना को लेकर अब राजस्व अमले और शासन के बीच मतभेद सामने आ गया है। योजना के तहत प्रदेश में करीब 50 लाख संपत्तियों की मुफ्त रजिस्ट्री किए जाने की प्रक्रिया प्रस्तावित है, लेकिन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर और कानूनी जवाबदेही को लेकर पटवारियों ने सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि अब तहसीलदार और राजस्व निरीक्षक भी इस आपत्ति में पटवारियों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।
मंगलवार को तहसीलदार संघ, राजस्व निरीक्षक संघ, मध्यप्रदेश पटवारी संघ और प्रांतीय पटवारी संघ ने संयुक्त रूप से अपना पक्ष रखा। राजस्व अमले का कहना है कि वह स्वामित्व योजना के क्रियान्वयन में पूरी तरह सहयोग कर रहा है। ड्रोन सर्वे, जमीन की पहचान, सीमांकन, मौके का सत्यापन और राजस्व रिकॉर्ड की जांच जैसे काम लगातार किए जा रहे हैं। लेकिन अंतिम संपत्ति दस्तावेज पर पटवारी को ‘निष्पादक’ के रूप में हस्ताक्षर करने की जिम्मेदारी देने पर गंभीर कानूनी सवाल खड़े हो रहे हैं।
पटवारियों का सवाल- कानूनी अधिकार किस आधार पर?
राजस्व कर्मचारी संगठनों का मुख्य सवाल यही है कि जिस जमीन या संपत्ति में पटवारी का कोई स्वामित्व, टाइटल, राइट या कानूनी हित नहीं है, उस संपत्ति से संबंधित दस्तावेज पर वह निष्पादक के तौर पर हस्ताक्षर किस अधिकार से करे?
संघों ने 13 अगस्त 2026 को जारी आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि इसमें पटवारी को संपत्ति दस्तावेज के निष्पादन की भूमिका दिए जाने की बात कही गई है। हालांकि, संगठनों का दावा है कि आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पटवारी को यह अधिकार किस अधिनियम, नियम, राजपत्र या वैध डेलिगेशन के तहत प्रदान किया गया है।
इसी वजह से संघों ने संबंधित आदेश की मूल फाइल, अनुमोदन प्रक्रिया और उससे जुड़े रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी को ऐसी कानूनी जिम्मेदारी देने से पहले उसके अधिकार और जवाबदेही का स्पष्ट वैधानिक आधार होना जरूरी है।
रिकॉर्ड की जांच और दस्तावेज निष्पादन अलग-अलग काम
राजस्व अमले ने अपनी आपत्ति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि जमीन का सर्वे करना, मौके पर जाकर जमीन की स्थिति देखना, सीमांकन करना और राजस्व रिकॉर्ड का सत्यापन करना एक प्रकार की प्रशासनिक जिम्मेदारी है। वहीं किसी संपत्ति संबंधी कानूनी दस्तावेज को शासन या संपत्ति के स्वामी की ओर से निष्पादित करना पूरी तरह अलग कानूनी प्रक्रिया है।
पटवारी संघों के अनुसार, मैदानी स्तर पर किसी जमीन का सत्यापन करने की जिम्मेदारी होने मात्र से किसी कर्मचारी को उस संपत्ति के कानूनी दस्तावेज को निष्पादित करने का अधिकार नहीं मिल जाता।
संघों ने मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 और भू-अभिलेख नियमावली, 2020 का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि उनके संज्ञान में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिसके तहत पटवारी को स्वतंत्र रूप से इस प्रकार की एग्जीक्यूशनरी पावर दी गई हो।
विवाद हुआ तो कोर्ट में जवाबदेही किसकी होगी?
पटवारियों की सबसे बड़ी चिंता संभावित कानूनी विवाद को लेकर है। उनका कहना है कि यदि भविष्य में किसी संपत्ति को लेकर विवाद पैदा होता है और संबंधित दस्तावेज की वैधता या स्वामित्व को अदालत में चुनौती दी जाती है, तो दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी या कर्मचारी को भी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।
इसी वजह से राजस्व अमला यह स्पष्टता चाहता है कि दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले कर्मचारी की कानूनी स्थिति क्या होगी और विवाद की स्थिति में उसकी जिम्मेदारी किस स्तर तक तय की जाएगी।
संघों का कहना है कि वे योजना का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनकी आपत्ति केवल उस प्रक्रिया को लेकर है, जिसमें पटवारी को ऐसी जिम्मेदारी दी जा रही है जिसके लिए स्पष्ट वैधानिक अधिकार और सुरक्षा की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
राजस्व संगठनों ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के 7 अप्रैल 2025 के एक फैसले का भी हवाला दिया है। यह मामला के. गोपी बनाम द सब-रजिस्ट्रार एवं अन्य से संबंधित है।
संघों का कहना है कि इस फैसले में दस्तावेज के निष्पादन और उससे जुड़े अधिकारों की कानूनी स्थिति पर महत्वपूर्ण बात सामने आई है। इसी आधार पर संगठन सवाल उठा रहे हैं कि जब पटवारी का संबंधित संपत्ति में कोई स्वामित्व या कानूनी हित नहीं है, तो उसे उस संपत्ति का दस्तावेज निष्पादित करने की शक्ति किस आधार पर दी जा रही है।
राजस्व अमले ने संविधान के अनुच्छेद 299 का भी उल्लेख किया है। संगठनों के मुताबिक यदि किसी दस्तावेज का निष्पादन राज्य की ओर से किया जा रहा है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित कर्मचारी को राज्य की ओर से दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने और राज्य को उस दस्तावेज से बाध्य करने का अधिकार किस वैधानिक प्रावधान के तहत मिला है।
पंजीयन और निष्पादन को लेकर भी स्पष्टता की मांग
राजस्व संगठनों ने यह भी कहा है कि संपत्ति के दस्तावेज का पंजीयन और दस्तावेज का निष्पादन दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। उनके अनुसार स्वामित्व योजना में पंजीयन से संबंधित भूमिका के लिए तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक या प्रभारी राजस्व निरीक्षक को सब-रजिस्ट्रार की भूमिका दिए जाने का उल्लेख है।
लेकिन पटवारी को दस्तावेज का ‘एक्जीक्यूटेंट’ बनाने के लिए अलग से स्पष्ट वैधानिक आधार दिखाई नहीं देता। यही मुद्दा अब विवाद का प्रमुख कारण बन गया है।
सर्वे और सत्यापन का काम जारी रखने पर सहमति
राजस्व अमले ने यह स्पष्ट किया है कि योजना से जुड़े मैदानी कार्यों को लेकर किसी प्रकार का विरोध नहीं है। ड्रोन से सर्वे, ग्राउंड ट्रूथिंग, जमीन की पहचान, सीमांकन, मौके का सत्यापन और राजस्व रिकॉर्ड की जांच जैसे कार्य पटवारियों की ओर से किए जाते रहेंगे।
असहमति केवल अंतिम संपत्ति दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने और उसके निष्पादन से जुड़ी कानूनी जवाबदेही को लेकर है। संघों का कहना है कि यदि शासन इस भूमिका के लिए स्पष्ट कानूनी आधार, अधिकार और जिम्मेदारी तय कर देता है, तो आगे की प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
50 लाख परिवारों पर पड़ सकता है असर
स्वामित्व योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को उनकी आवासीय संपत्ति का अधिकार संबंधी दस्तावेज उपलब्ध कराना है। इससे संपत्ति के स्वामित्व को लेकर विवाद कम करने, ग्रामीण परिवारों को कानूनी दस्तावेज उपलब्ध कराने और जरूरत पड़ने पर संपत्ति के आधार पर वित्तीय सुविधाएं प्राप्त करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
ऐसे में यदि दस्तावेज तैयार करने और उनके निष्पादन की प्रक्रिया पर विवाद लंबा खिंचता है, तो इसका असर योजना की गति पर पड़ सकता है। प्रदेश में करीब 50 लाख मुफ्त रजिस्ट्रियों का लक्ष्य होने के कारण यह मामला बड़े स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिलहाल राजस्व कर्मचारी संगठन अपने रुख पर कायम हैं। उनका कहना है कि वे सरकार की योजना में बाधा नहीं बनना चाहते, लेकिन ऐसी कानूनी जिम्मेदारी भी नहीं लेना चाहते जिसका स्पष्ट वैधानिक आधार और भविष्य की जवाबदेही तय न हो।
अब निगाह इस बात पर है कि शासन इस आपत्ति पर क्या कानूनी स्पष्टीकरण देता है और क्या दस्तावेज के निष्पादन की जिम्मेदारी को लेकर कोई नया आदेश या स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं। यदि सरकार और राजस्व संगठनों के बीच इस मुद्दे पर सहमति बनती है, तभी स्वामित्व योजना के तहत प्रस्तावित लाखों संपत्ति दस्तावेजों की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ सकेगी।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस