जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान दर्ज FIR रद्द कराने के लिए केंद्र पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, अनुच्छेद 142 के तहत राहत की मांग
नीट पेपर लीक मामले में प्रदर्शन के दौरान दर्ज की गई एफआईआर का मामला सुप्रीम कोर्ट में है. CJP लगातार FIR रद्द करने की मांग उठा रही है. इस बीच केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है
केंद्र सरकार ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले छात्रों से जुड़ी एफआईआर रद्द करवाने के लिए याचिका लगाई है। यह जानकारी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दी। उन्होंने बताया कि FIR रद्द कराने के लिए हम अनुच्छेद 142 का सहारा ले रहे हैं।सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर मंगलवार को सुनवाई के लिए तैयार हो गया है।
नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर हुए छात्र और नागरिक प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत में आवेदन दाखिल कर प्रदर्शन से जुड़े मामलों में राहत देने का अनुरोध किया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग की है।
इस मामले में सोमवार, 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि छात्र प्रदर्शन से जुड़े मामले में केंद्र सरकार की ओर से एक आवेदन दाखिल किया जा रहा है। सॉलिसिटर जनरल ने आग्रह किया कि इस आवेदन पर जल्द सुनवाई की जाए और मामले को मंगलवार को ही सूचीबद्ध किया जाए।
मंगलवार को होगी मामले की सुनवाई
सॉलिसिटर जनरल की दलील सुनने के बाद CJI सूर्य कांत ने पूछा कि क्या मामले की तत्काल सुनवाई करना जरूरी है। इस पर तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि मामले के पक्षकारों के बीच विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने की स्थिति बन रही है।
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि यदि पक्षकार आपसी सहमति से मामले को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो अदालत को इसमें कोई आपत्ति नहीं है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मंगलवार, 1 सितंबर को सुनवाई के लिए लगाने पर सहमति जताई।
इस सुनवाई को जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान दर्ज एफआईआर को लेकर अहम माना जा रहा है, क्योंकि केंद्र सरकार की ओर से खुद सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शनकारियों को राहत देने का प्रस्ताव रखा गया है।
अनुच्छेद 142 के तहत मांगी गई विशेष राहत
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल करने का आग्रह किया है। अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को किसी मामले में 'पूर्ण न्याय' करने के लिए आवश्यक आदेश पारित करने की शक्ति प्राप्त है।
यह प्रावधान सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में व्यापक राहत देने की अनुमति देता है, जहां सामान्य कानूनी प्रक्रिया के अलावा विवाद को पूरी तरह समाप्त करने के लिए विशेष आदेश की आवश्यकता महसूस हो। अदालत ने अतीत में भी अलग-अलग मामलों में अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए व्यापक आदेश जारी किए हैं।
इस मामले में केंद्र की मांग का उद्देश्य प्रदर्शन से जुड़े उन मामलों को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ना है, जिनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थीं।
जुलाई के आंदोलन के बाद शुरू हुआ विवाद
जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन का मामला जुलाई में हुए आंदोलन से जुड़ा है। इस दौरान बड़ी संख्या में छात्रों और आम नागरिकों ने विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन किया था। आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच कई मुद्दों पर बातचीत भी हुई थी।
प्रदर्शनकारियों का आरोप रहा है कि आंदोलन खत्म होने के दौरान सरकार की ओर से जिन मांगों पर आश्वासन दिया गया था, उन्हें पूरी तरह लागू नहीं किया गया। इनमें आंदोलन में शामिल लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को वापस लेना भी प्रमुख मांगों में शामिल बताया जा रहा है।
इसी मुद्दे को लेकर अब एक बार फिर प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। आंदोलन से जुड़े लोगों ने 5 सितंबर को इंडिया गेट के आसपास मार्च निकालने का आह्वान किया है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जुलाई में आंदोलन के दौरान सरकार की ओर से किए गए वादों को पूरा नहीं किया जा रहा है। ऐसे में वे दोबारा सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं।
5 सितंबर के मार्च का ऐलान
'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) से जुड़े लोगों की ओर से 5 सितंबर को मार्च का आह्वान किया गया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जुलाई के आंदोलन के बाद जिन मुद्दों पर सरकार की ओर से आश्वासन दिए गए थे, उनमें से कई अभी तक लंबित हैं।
एफआईआर वापस लेने की मांग इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि आंदोलन के दौरान दर्ज किए गए मामलों को वापस लिया जाना चाहिए, ताकि आंदोलन में शामिल छात्रों और आम नागरिकों को राहत मिल सके।
हालांकि, सरकार का रुख इस मामले में पूरी तरह से सभी आरोपियों को राहत देने वाला नहीं रहा है।
सरकार ने पहले भी रखा था अपना पक्ष
सुप्रीम कोर्ट में हुई पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से कहा गया था कि वह छात्रों और आम नागरिकों को राहत देने के पक्ष में है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि आंदोलन के दौरान आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहे या आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने पर विचार नहीं किया जाएगा।
सरकार का कहना था कि प्रदर्शन के नाम पर यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज है, तो केवल आंदोलन में शामिल होने के आधार पर ऐसे मामलों को खत्म नहीं किया जा सकता।
यही वजह है कि अब केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल आवेदन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत को यह तय करना होगा कि किन मामलों में राहत दी जा सकती है और किन मामलों को जारी रखा जाना चाहिए।
छात्रों और आम नागरिकों को मिल सकती है राहत
यदि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के आवेदन पर सहमति जताता है, तो प्रदर्शन से जुड़े बड़ी संख्या में छात्रों और आम नागरिकों को राहत मिलने की संभावना बन सकती है। हालांकि अंतिम फैसला अदालत की सुनवाई और उसके आदेश पर निर्भर करेगा।
मंगलवार को होने वाली सुनवाई में अदालत केंद्र सरकार के आवेदन, प्रदर्शनकारियों के पक्ष और एफआईआर की प्रकृति पर विचार कर सकती है। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अदालत अनुच्छेद 142 के तहत किस सीमा तक अपने अधिकार का इस्तेमाल करती है।
मामले में सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच सहमति बनने की संभावना को देखते हुए सोमवार की सुनवाई में अदालत ने तत्काल कोई विस्तृत आदेश पारित नहीं किया। CJI सूर्य कांत ने भी संकेत दिया कि यदि पक्षकार आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो अदालत को इसमें कोई परेशानी नहीं है।
5 सितंबर के मार्च से पहले बढ़ी मामले की अहमियत
5 सितंबर को प्रस्तावित मार्च से पहले केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट पहुंचना इस पूरे मामले को और महत्वपूर्ण बना देता है। यदि अदालत मंगलवार को कोई ऐसा आदेश देती है जिससे प्रदर्शनकारियों को एफआईआर के मामले में राहत मिलती है, तो इससे प्रस्तावित मार्च को लेकर भी स्थिति प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर, यदि गंभीर आपराधिक मामलों में कोई राहत नहीं दी जाती है तो सरकार की पहले से कही गई स्थिति कायम रह सकती है कि केवल छात्रों और सामान्य प्रदर्शनकारियों को राहत दी जाए, जबकि आपराधिक रिकॉर्ड या गंभीर आरोपों वाले लोगों के खिलाफ मामले जारी रहें।
फिलहाल सभी की नजरें 1 सितंबर की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत इस बात पर विचार करेगी कि केंद्र के आवेदन पर किस तरह की राहत दी जा सकती है और अनुच्छेद 142 की शक्ति का इस्तेमाल किस सीमा तक किया जाए।
जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। एक तरफ प्रदर्शनकारी सरकार से जुलाई के आंदोलन के दौरान किए गए कथित वादों को पूरा करने की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार एफआईआर के मामलों में छात्रों और आम नागरिकों को राहत देने की दिशा में अदालत के सामने अपना पक्ष रख रही है। ऐसे में मंगलवार की सुनवाई इस विवाद के आगे की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस