बारिश ने चौपट की फसल, अब बीमा सर्वे पर घमासान; जालौन में 1.90 लाख से ज्यादा आवेदन, मिड सीजन सर्वे से बाहर रखने पर किसानों में भारी नाराजगी
बारिश से जालौन में तिलहन और दलहन की फसलों को भारी नुकसान का दावा, 1.90 लाख से ज्यादा फसल बीमा आवेदन के बावजूद मिड सीजन सर्वे में जिला शामिल न होने से किसानों में नाराजगी। पिछले फसल नुकसान के सर्वे और बीमा कंपनी के आकलन में बड़े अंतर का आरोप, कंपनी से पक्ष नहीं मिल सका।
1.90 लाख से अधिक बीमा आवेदन, 72,950 हेक्टेयर क्षेत्र बीमित; मिड सीजन सर्वे से जालौन को बाहर रखने पर किसानों ने उठाए सवाल
उरई। जालौन जिले में लगातार बारिश से फसलों को हुए नुकसान के बाद किसानों की मुश्किलें अब फसल बीमा के सर्वे और मुआवजे की प्रक्रिया को लेकर बढ़ती नजर आ रही हैं। खेतों में तिलहन और दलहन की फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचने का दावा करते हुए किसान वास्तविक क्षति का सही आकलन कराने और बीमा योजना के तहत राहत दिलाने की मांग कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि गंभीर नुकसान के बावजूद जालौन जिले को मिड सीजन सर्वे में शामिल नहीं किया गया, जिससे प्रभावित किसानों के सामने फसल बीमा से मिलने वाली राहत को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है।
किसानों की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, जिले में किसान क्रेडिट कार्ड यानी केसीसी के माध्यम से फसल बीमा के 1,76,871 आवेदन किए गए हैं। वहीं, किसानों की ओर से स्वयं 13,182 आवेदन किए जाने की जानकारी दी गई है। इस तरह उपलब्ध आंकड़ों में कुल 1,90,053 आवेदन बताए गए हैं। इन आवेदनों के तहत कुल बीमित क्षेत्र करीब 72,950 हेक्टेयर बताया गया है। हालांकि, आवेदन की संख्या को अलग-अलग लाभार्थी किसानों की संख्या मानने से पहले संबंधित सरकारी और बीमा अभिलेखों से पुष्टि किया जाना जरूरी है।
फसल नुकसान के बीच सर्वे को लेकर सबसे बड़ा सवाल
किसानों का कहना है कि बारिश के कारण खेतों में खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। कई क्षेत्रों में पानी भरने और लगातार बारिश के कारण तिलहन व दलहन की फसलें प्रभावित हुई हैं। किसानों के सामने एक तरफ तैयार फसल के बर्बाद होने का संकट है तो दूसरी तरफ यह चिंता भी है कि बीमा कंपनी नुकसान का आकलन किस आधार पर करेगी।
किसानों का आरोप है कि जिले में बड़े पैमाने पर फसल नुकसान के बावजूद मिड सीजन सर्वे नहीं कराया गया। उनका कहना है कि जब खेतों में नुकसान साफ दिखाई दे रहा है तो समय रहते सर्वे होने से वास्तविक स्थिति सामने आ सकती थी। किसानों की मांग है कि खेत स्तर पर पारदर्शी तरीके से नुकसान का आकलन कराया जाए, ताकि बीमा दावे के समय उन्हें परेशानी का सामना न करना पड़े।
1.90 लाख से ज्यादा आवेदन, 72,950 हेक्टेयर बीमित क्षेत्र
उपलब्ध विवरण के मुताबिक जिले में फसल बीमा के कुल 1,90,053 आवेदन बताए जा रहे हैं। इनमें केसीसी के माध्यम से किए गए 1,76,871 आवेदन और किसानों द्वारा स्वयं किए गए 13,182 आवेदन शामिल हैं। इन आवेदनों के तहत करीब 72,950 हेक्टेयर क्षेत्र का बीमा होने की जानकारी सामने आई है।
वहीं, उपलब्ध दस्तावेजों में सरकार की ओर से बीमा कंपनी के लिए करीब 21.81 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत होने की बात भी सामने आई है। हालांकि, यह राशि किस मद में स्वीकृत हुई और इसका प्रीमियम अथवा दावा भुगतान से क्या संबंध है, इसे संबंधित आधिकारिक अभिलेखों से स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
पिछले साल के नुकसान ने बढ़ाई किसानों की चिंता
किसानों ने वर्ष 2025 में रबी की फसल को ओलावृष्टि से हुए नुकसान का उदाहरण भी सामने रखा है। उनका दावा है कि उस समय प्रशासनिक स्तर पर कराए गए सर्वे में कई क्षेत्रों में फसल क्षति 40 से 70 प्रतिशत तक आंकी गई थी। इसके विपरीत किसानों का आरोप है कि बीमा कंपनी की ओर से नुकसान का आकलन केवल दो से पांच प्रतिशत के आसपास माना गया।
किसानों का कहना है कि यदि प्रशासनिक सर्वे और बीमा कंपनी के आकलन में इतना बड़ा अंतर रहा है तो उसके कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उनका सवाल है कि फसल नुकसान का अंतिम निर्धारण किस वैज्ञानिक और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर किया जाता है और किसानों के दावों का मूल्यांकन किस स्तर पर होता है।
बुंदेलखंड के दूसरे जिलों का उदाहरण दे रहे किसान
जालौन के किसानों का यह भी कहना है कि बुंदेलखंड के अन्य जिलों को मिड सीजन सर्वे में शामिल किया गया है, जबकि जालौन को इससे बाहर रखा गया। इसी बात को लेकर किसानों में नाराजगी बढ़ रही है।
किसानों का कहना है कि यदि आसपास के क्षेत्रों में फसल नुकसान की स्थिति को देखते हुए मिड सीजन सर्वे की जरूरत महसूस की गई है तो जालौन के प्रभावित क्षेत्रों का भी निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। उनका कहना है कि बारिश का असर केवल कागजों में दर्ज आंकड़ों से नहीं, बल्कि खेतों में जाकर देखा जाना चाहिए।
बीमा कंपनी की भूमिका पर उठ रहे सवाल
फसल बीमा योजना का उद्देश्य प्राकृतिक आपदा से फसल प्रभावित होने की स्थिति में किसानों को आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे में किसानों की मुख्य चिंता यही है कि नुकसान का आकलन पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से हो।
किसानों के आरोपों के बीच अब बीमा कंपनी की सर्वे प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, कंपनी की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक स्थिति सामने आना बाकी है। बिना कंपनी का पक्ष जाने सर्वे में कथित लापरवाही अथवा नुकसान का कम आकलन किए जाने के आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी सवाल
फसल नुकसान और बीमा सर्वे को लेकर किसान स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं। किसानों का कहना है कि जब बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक आपदा से प्रभावित हैं तो उनकी समस्या को शासन और प्रशासन के सामने मजबूती से उठाया जाना चाहिए।
किसानों की मांग है कि प्रभावित क्षेत्रों में वास्तविक फसल नुकसान का दोबारा परीक्षण कराया जाए और पात्र किसानों को बीमा योजना के नियमों के अनुसार राहत उपलब्ध कराई जाए। साथ ही पिछले सर्वे में सामने आए प्रशासनिक और बीमा कंपनी के आकलन के अंतर की भी जांच कराई जाए।
कंपनी का पक्ष नहीं मिल सका
इस पूरे मामले में एसबीआई इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के जिला प्रबंधक बताए गए पवन कुमार से पक्ष जानने के लिए उपलब्ध मोबाइल नंबर पर कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी। कंपनी का पक्ष प्राप्त नहीं होने के कारण मिड सीजन सर्वे, फसल नुकसान के आकलन और जालौन को सर्वे में शामिल किए जाने संबंधी किसानों के आरोपों पर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
फिलहाल बारिश से प्रभावित किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनकी बर्बाद हुई फसल का वास्तविक आकलन कब और किस स्तर पर होगा। हजारों हेक्टेयर में नुकसान के दावों और 1.90 लाख से अधिक बीमा आवेदनों के बीच किसानों की नजर अब प्रशासन और बीमा कंपनी की अगली कार्रवाई पर टिकी है। किसानों को उम्मीद है कि खेतों में हुए वास्तविक नुकसान को आधार बनाकर पारदर्शी सर्वे कराया जाएगा और पात्र किसानों को समय पर बीमा राहत मिल सकेगी।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस