सिंहस्थ-2028 की रेल बायपास परियोजना पर किसानों का विरोध, 189 करोड़ के प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण पर विवाद; सर्वे टीम को लौटना पड़ा

सिंहस्थ-2028 के लिए उज्जैन में प्रस्तावित 189 करोड़ रुपए की रेलवे बायपास परियोजना का किसानों ने विरोध शुरू कर दिया है। शुक्रवार को नईखेड़ी से चिंतामन तक 8.60 किमी लंबी रेल लाइन का सर्वे करने पहुंची टीम को किसानों ने घेर लिया।

सिंहस्थ-2028 की रेल बायपास परियोजना पर किसानों का विरोध, 189 करोड़ के प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण पर विवाद; सर्वे टीम को लौटना पड़ा

पांच गांवों के 85 सर्वे नंबरों की जमीन पर अधिग्रहण की तैयारी

 बाजार मूल्य और सरकारी गाइडलाइन के बीच मुआवजे का बड़ा अंतर

उज्जैन। सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के बीच उज्जैन में प्रस्तावित रेलवे बायपास परियोजना को लेकर जमीन अधिग्रहण का विवाद गहराने लगा है। करीब 189 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली चिंतामन-नईखेड़ी रेल बायपास लाइन का स्थानीय किसानों ने विरोध शुरू कर दिया है। शुक्रवार को जमीन का सर्वे और खेतों में मौजूद परिसंपत्तियों का मूल्यांकन करने पहुंची प्रशासन एवं रेलवे की संयुक्त टीम को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा। किसानों ने टीम को घेरकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। हालात ऐसे बने कि तहसीलदार, पटवारी और रेलवे अधिकारियों को बिना सर्वे किए ही वापस लौटना पड़ा।

किसानों का कहना है कि उनकी जमीन का बाजार मूल्य करोड़ों रुपए प्रति बीघा है, जबकि प्रस्तावित मुआवजे की गणना गाइडलाइन दर के आधार पर की जा रही है। किसानों के मुताबिक, बाजार में जिस जमीन की कीमत 3 से 4 करोड़ रुपए प्रति बीघा है, उसके बदले करीब 60 लाख रुपए मुआवजा मिलने की बात कही जा रही है। उनका आरोप है कि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है और प्रभावित किसानों को अब तक पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।

पांच गांवों के 85 सर्वे नंबरों की जमीन पर अधिग्रहण की तैयारी

प्रस्तावित रेल बायपास के लिए पांच गांवों की जमीन चिह्नित की जा रही है। इनमें दाउदखेड़ी, चिंतामन, मोहनपुरा, मंगरोला और उज्जैन कस्बा क्षेत्र शामिल हैं। इन गांवों के करीब 85 सर्वे नंबरों की जमीन परियोजना के दायरे में आ रही है।

किसानों का कहना है कि रेलवे ने इस परियोजना के लिए अब तक चार से पांच बार अलाइनमेंट में बदलाव किया है। शुरुआत में जिन वैकल्पिक रास्तों पर विचार किया गया था, उनसे कम जमीन का अधिग्रहण होता और परियोजना की लागत भी अपेक्षाकृत कम रहती। लेकिन बाद में रूट में बदलाव कर दिया गया और अब रेल लाइन किसानों के खेतों की ओर से निकाली जा रही है।

किसानों के अनुसार, बार-बार अलाइनमेंट बदलने के कारण प्रभावित परिवारों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। किसी किसान की कितनी जमीन ली जाएगी, किसकी जमीन का कितना हिस्सा प्रभावित होगा और अधिग्रहण के बाद खेतों तक पहुंचने का रास्ता कैसे रहेगा, इन सवालों का भी स्पष्ट जवाब नहीं मिला है।

बाजार मूल्य और सरकारी गाइडलाइन के बीच मुआवजे का बड़ा अंतर

जमीन के मुआवजे को लेकर किसानों की सबसे बड़ी नाराजगी सामने आई है। किसानों का दावा है कि प्रस्तावित रेल लाइन के आसपास पिछले कुछ वर्षों में तेजी से शहरी विकास हुआ है। यहां सात कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं और कई बड़े होटल भी बन गए हैं। क्षेत्र में जमीन की व्यावसायिक संभावनाएं बढ़ने के कारण संपत्तियों के दाम में भी काफी उछाल आया है।

किसानों के मुताबिक, आसपास के क्षेत्र में प्लॉट की कीमत लगभग 4 हजार रुपए प्रति वर्गफीट तक पहुंच चुकी है। वहीं कृषि भूमि का बाजार मूल्य 3 से 4 करोड़ रुपए प्रति बीघा बताया जा रहा है। इसके मुकाबले सरकारी गाइडलाइन दर करीब 15 लाख रुपए प्रति बीघा बताई जा रही है। इसी दर को आधार बनाकर चार गुना मुआवजे की गणना करने पर लगभग 60 लाख रुपए प्रति बीघा की राशि सामने आ रही है।

किसानों का कहना है कि करोड़ों रुपए की बाजार कीमत वाली जमीन के बदले इतनी कम राशि स्वीकार करना उनके लिए संभव नहीं है। उनका यह भी आरोप है कि मुआवजे से जुड़ी जानकारी उन्हें लिखित दस्तावेजों के माध्यम से देने के बजाय मौखिक रूप से बताई गई है।

पहले पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करे रेलवे और प्रशासन

किसानों ने स्पष्ट किया है कि वे विकास कार्यों के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उनकी जमीन से जुड़ा कोई भी निर्णय बिना पर्याप्त जानकारी और उचित मुआवजे के नहीं होना चाहिए। उनकी मांग है कि रेलवे और जिला प्रशासन सभी प्रभावित किसानों को एक साथ बैठाकर परियोजना की पूरी जानकारी दें।

किसान चाहते हैं कि उन्हें लिखित रूप में बताया जाए कि किस किसान की कितनी जमीन अधिग्रहित की जाएगी, मुआवजे की गणना किस आधार पर होगी और खेतों में मौजूद पेड़, ट्यूबवेल तथा अन्य निर्माणों का मूल्यांकन किस नियम के तहत किया जाएगा। इसके साथ ही प्रस्तावित रेल लाइन का अंतिम अलाइनमेंट भी सार्वजनिक किया जाए।

किसानों का कहना है कि जब तक इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक जमीन से संबंधित सर्वे और अन्य प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जानी चाहिए। उनका कहना है कि जानकारी मिलने के बाद वे स्वयं प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी जमीन दिखाने और मूल्यांकन में सहयोग करने के लिए तैयार हैं।

अलाइनमेंट को लेकर कोर्ट में भी पहुंचा मामला

रेलवे बायपास के रूट को लेकर किसानों की नाराजगी अब न्यायालय तक पहुंच चुकी है। प्रभावित किसानों ने प्रस्तावित अलाइनमेंट पर आपत्ति दर्ज कराई है। किसानों के मुताबिक, रेलवे अधिकारियों ने न्यायालय में अपना जवाब प्रस्तुत करने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा है।

ऐसे में किसानों ने सवाल उठाया कि जब अलाइनमेंट से जुड़ा मामला न्यायालय में विचाराधीन है और रेलवे की ओर से जवाब भी प्रस्तुत नहीं किया गया है, तो फिर जमीन पर सर्वे की प्रक्रिया क्यों शुरू की जा रही है।

किसान जीतसिंह फौजी ने आरोप लगाया कि शुक्रवार को प्रशासन और रेलवे की टीम बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के खेतों में पहुंच गई। किसानों को यह भी स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई कि सर्वे करने आए अधिकारी किस विभाग से हैं और किस आदेश के तहत यह कार्रवाई की जा रही है।

उन्होंने कहा कि किसान प्रशासन से टकराव नहीं चाहते, लेकिन अपनी जमीन और संपत्ति के संबंध में जानकारी मांगना उनका अधिकार है। पहले अधिग्रहण और मुआवजे की स्थिति स्पष्ट की जाए, उसके बाद आगे की कार्रवाई की जाए।

ट्यूबवेल और पेड़ों के मूल्यांकन के लिए पहुंची थी टीम

शुक्रवार को मौके पर पहुंची प्रशासनिक टीम का उद्देश्य खेतों में मौजूद परिसंपत्तियों का मूल्यांकन करना था। इसमें ट्यूबवेल, पेड़ और अन्य संपत्तियों की जानकारी जुटाई जानी थी। नायब तहसीलदार दीप्ति मांझी ने बताया कि टीम किसानों से इन परिसंपत्तियों के मूल्यांकन के लिए अनुमति मांग रही थी, लेकिन किसान पहले जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़ी जानकारी चाहते थे।

उन्होंने बताया कि किसानों को दीपावली के बाद कार्यालय बुलाकर उनकी शंकाओं का समाधान करने और पूरी जानकारी देने की बात कही गई थी। नायब तहसीलदार के अनुसार, संबंधित क्षेत्र की गाइडलाइन और मुख्य सड़क से लगी जमीन की गाइडलाइन में अंतर है। इसी वजह से मुआवजे की राशि को लेकर किसानों के बीच असंतोष है।

प्रशासन की ओर से किसानों को समझाने और उनकी आपत्तियों का समाधान करने की बात कही गई है। हालांकि, शुक्रवार को विरोध के कारण सर्वे की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

189 करोड़ की लागत से बनेगी 8.60 किलोमीटर लंबी रेल लाइन

सिंहस्थ-2028 के दौरान उज्जैन पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और ट्रेनों की बढ़ती आवाजाही को देखते हुए रेलवे ने इस बायपास परियोजना की योजना बनाई है। चिंतामन से नईखेड़ी तक लगभग 8.60 किलोमीटर लंबी रेल लाइन का निर्माण प्रस्तावित है। इस परियोजना पर रेलवे करीब 189.04 करोड़ रुपए खर्च करेगी।

बायपास रेल लाइन का प्रमुख उद्देश्य उज्जैन रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों के दबाव को कम करना है। वर्तमान व्यवस्था में इंदौर से नागदा की ओर जाने वाली कई ट्रेनों को उज्जैन स्टेशन से होकर गुजरना पड़ता है। इससे ट्रेनों के संचालन में अतिरिक्त समय लगता है। कुछ ट्रेनों को दिशा बदलने और इंजन रिवर्सल जैसी प्रक्रियाओं से भी गुजरना पड़ता है।

नई रेल लाइन तैयार होने के बाद इंदौर से नागदा की ओर जाने वाली ट्रेनों को उज्जैन स्टेशन पर लाए बिना सीधे बायपास से निकाला जा सकेगा। इससे ट्रेनों के संचालन में लगने वाला अतिरिक्त समय बचेगा और स्टेशन पर यातायात का दबाव कम करने में मदद मिलेगी।

रेलवे का अनुमान है कि इस बायपास के बनने से उज्जैन रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों का दबाव लगभग 30 प्रतिशत तक कम हो सकता है। सिंहस्थ के दौरान देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उज्जैन पहुंचेंगे। ऐसे में रेल यातायात को सुचारु बनाए रखने के लिए यह परियोजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

विकास परियोजना के सामने जमीन अधिग्रहण की चुनौती

सिंहस्थ-2028 को लेकर उज्जैन में सड़क, रेलवे और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास पर तेजी से काम करने की तैयारी है। रेलवे बायपास भी इसी व्यापक योजना का हिस्सा है। लेकिन परियोजना शुरू होने से पहले ही जमीन अधिग्रहण, अलाइनमेंट और मुआवजे को लेकर विवाद सामने आ गया है।

एक तरफ रेलवे के सामने समय पर निर्माण पूरा करने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ किसान अपनी जमीन के उचित मूल्य और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं। यदि दोनों पक्षों के बीच जल्द सहमति नहीं बनती है, तो परियोजना की आगे की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

फिलहाल किसानों के विरोध के कारण सर्वे टीम को वापस लौटना पड़ा है। अब निगाहें दीपावली के बाद प्रस्तावित प्रशासनिक बैठक और किसानों को दी जाने वाली जानकारी पर टिकी हैं। परियोजना का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि रेलवे और प्रशासन किसानों की आपत्तियों का किस तरह समाधान करते हैं और जमीन अधिग्रहण को लेकर पारदर्शी एवं स्वीकार्य व्यवस्था कैसे तैयार की जाती है।